मनेंद्रगढ़–चिरमिरी–भरतपुर/RTI कार्यकर्ता राजकुमार मिश्रा ने कलेक्टर को जनदर्शन में सनसनीखेज शिकायत सौंपते हुए छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल पर शासकीय स्वैच्छिक अनुदान राशि को निजी अनुकंपा फंड की तरह बांटने का गंभीर आरोप लगाया है। मिश्रा का आरोप है कि मंत्री द्वारा अपात्र लोगों, अपने राजनीतिक शुभचिंतकों और करीबी व्यक्तियों को नियमों को ताक पर रखकर अनुदान दिलाया गया, जिससे शासन को लाखों रुपये की सीधी आर्थिक क्षति हुई है।
RTI कार्यकर्ता के अनुसार, स्वैच्छिक अनुदान की राशि का वितरण नियमों के बजाय “सिफारिश तंत्र” के आधार पर किया गया। मंत्री के करीबी लोग स्वयं कलेक्टर कार्यालय में उपस्थित होकर चेक प्राप्त करते हैं और लाभार्थियों के घर तक पहुंचाते हैं। बदले में उपकृत होने का खेल चलता है। इतना ही नहीं, इस पूरी प्रक्रिया को फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पर प्रचारित किया जाता है, जबकि नियम स्पष्ट है कि कोई भी जनप्रतिनिधि या उसका प्रतिनिधि स्वैच्छिक अनुदान राशि वितरित नहीं कर सकता।
RTI कार्यकर्ता श्री मिश्रा का कहना है कि यदि स्वास्थ्य मंत्री द्वारा अपात्र व्यक्तियों के लिए भुगतान की अनुशंसा नहीं की जाती, तो यह राशि जारी ही नहीं होती। स्पष्ट है कि अनुशंसा ही अनियमित भुगतान की जड़ है और इसी कारण राज्य सरकार का लाखों रुपये का नुकसान हुआ है।
RTI के तहत प्राप्त दस्तावेजों का हवाला देते हुए मिश्रा ने आरोप लगाया कि वित्तीय वर्ष 2023-24 और 2024-25 में स्वैच्छिक अनुदान वितरण में गंभीर गड़बड़ियां हुई हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील मदों में ऐसे लोगों को राशि दी गई जिनका न तो शिक्षा से कोई संबंध है और न ही स्वास्थ्य संकट से। कई अत्यंत वृद्ध और अशिक्षित व्यक्तियों को शिक्षा के नाम पर ₹20-20 हजार दिए गए, जबकि मंत्री के करीबी लोगों को शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों शीर्षों में ₹20 हजार से ₹25 हजार तक की राशि दिलाई गई।
शिकायत में यह भी चौंकाने वाला खुलासा किया गया है कि ₹1 लाख से अधिक मासिक वेतन पाने वाले एसईसीएल कर्मचारियों को भी स्वैच्छिक अनुदान दिया गया। इतना ही नहीं, कुछ मामलों में एक ही परिवार के पांच सदस्यों को एक साथ बीमार दर्शाकर प्रत्येक को ₹25-25 हजार की राशि जारी कर दी गई। सवाल यह है कि क्या पूरा परिवार एक साथ बीमार पड़ा या फिर कागजों पर बीमारी का कारोबार चलाया गया?
RTI कार्यकर्ता ने इसे सीधा-सीधा वित्तीय अनियमितता और आपराधिक कृत्य करार देते हुए कहा कि स्वैच्छिक अनुदान कोई मंत्री या जनप्रतिनिधि की जेब से दिया जाने वाला धन नहीं है, बल्कि यह राज्य सरकार का सार्वजनिक धन है। नियमों के अनुसार अनुदान देने से पहले लाभार्थी की पात्रता, उद्देश्य, अधिकतम सीमा और उपयोगिता प्रमाण पत्र अनिवार्य होता है। इन शर्तों की अनदेखी कर अनुदान देना भारत के संविधान के अनुच्छेद 266(3) का खुला उल्लंघन है।
मिश्रा ने कलेक्टर से मांग की है कि वर्ष 2023-24 और 2024-25 में स्वैच्छिक अनुदान पाने वाले सभी लाभार्थियों की आधार से उम्र की पुष्टि, अनुदान के उद्देश्य की भौतिक जांच तथा बैंक खातों की विस्तृत जांच कराई जाए, ताकि यह सामने आ सके कि सरकारी धन का उपयोग वास्तव में किसके लिए और किस उद्देश्य से किया गया।
RTI कार्यकर्ता ने साफ कहा है कि यदि इस मामले में निष्पक्ष जांच नहीं होती, तो यह स्वैच्छिक अनुदान नहीं बल्कि शासकीय धन की खुली बंदरबांट का उदाहरण बन जाएगा। अब देखना यह है कि कलेक्टर स्तर पर इस गंभीर शिकायत पर कितनी गंभीरता से कार्रवाई होती है, या फिर मामला फाइलों में दबा दिया जाता है।








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