कोरिया जिले में आखिर सी.पी. पटेल ही क्यों हैं अपवाद? क्या अन्य विभागों के रिटायर्ड कर्मचारी भी चला रहे हैं दफ्तर या सिर्फ यहीं मेहरबान है प्रशासन?
बैकुंठपुर। कोरिया वन मंडल कार्यालय में नियमों, प्रशासनिक मर्यादाओं और शासकीय कायदों की जिस तरह से धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, वह अब हास्यास्पद होने के साथ-साथ बेहद शर्मनाक मोड़ पर पहुँच चुका है। करीब एक माह पहले सेवानिवृत्त हो चुके मानचित्रकार सी.पी. पटेल का दफ्तर मोह खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। आम कार्य दिवस तो छोड़िए, शनिवार और रविवार जैसे शासकीय अवकाश के दिनों में भी यह सेवामुक्त व्यक्ति दफ्तर में बैठकर सरकारी फाइलें और नक्शे खंगालता पाया जा रहा है।हालत यह हो गई है कि लोग अब तंज कसते हुए पूछ रहे हैं"छुट्टी के दिन भी काम करने वाले ये मानचित्रकार क्या अब रात में वन मंडल कार्यालय के चौकीदार की भी जिम्मेदारी संभालेंगे?
शासकीय नियमों और प्रशासनिक व्यवस्था की नाक के नीचे एक गैर-कानूनी और अनधिकृत काम बदस्तूर जारी है। बिना किसी वैधानिक आदेश या संविदा नियुक्ति के एक बाहरी व्यक्ति का दफ्तर की सरकारी कुर्सी पर बैठकर फाइलें निपटाना यह साबित करता है कि जिले में नियम-कायदों की समझ और जिम्मेदारी का कितना भारी अकाल पड़ चुका है।
क्या पूरे कोरिया जिले में सी.पी. पटेल ही एकमात्र 'अमर' अपवाद हैं?
कोरिया जिले के अन्य शासकीय विभागों में भी हर महीने m कर्मचारी सेवानिवृत्त होते हैं। क्या रिटायरमेंट के बाद वे भी इसी तरह दफ्तर में आकर फाइलें निपटाते हैं? यदि नहीं, तो केवल कोरिया वन मंडल में सी.पी. पटेल को ही यह 'विशेष छूट' और अनधिकृत लाइसेंस क्यों दिया गया है?बड़ा सवाल है कि,छुट्टी के दिन जब नियमित कर्मचारी अपने परिवार के साथ समय बिताते हैं, तब एक रिटायर्ड कर्मचारी का अकेले बैठकर दफ्तर में फाइलों को खंगालना किसी बड़े लेन-देन, साक्ष्यों को नष्ट करने या करोड़ों रुपये के प्लांटेशन के नक्शों में हेराफेरी की आशंका को सीधे तौर पर बल देता है।यदि कल को वन मंडल कार्यालय से कोई संवेदनशील नक्शा या गोपनीय फाइल गायब होती है या उसमें कोई हेरफेर पाया जाता है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
शीर्ष अधिकारियों का ढर्रा सवालों के घेरे में
प्रशासनिक दक्षता का तकाजा कहता है कि कार्यालय प्रमुख को अपने मातहत चल रही हर गतिविधि की खबर होनी चाहिए और नियमों का सख्ती से पालन कराया जाना चाहिए। लेकिन कोरिया वन मंडल में स्थिति इसके ठीक उलट है।इस पूरे गंभीर मामले, नियमों की अनदेखी और उठते सवालों पर जब वनमंडलाधिकारी (DFO) चंद्रशेखर शंकर सिंह परदेशी और वृत्त के मुख्य वन संरक्षक (CCF) दोनों से उनका पक्ष जानने के लिए दूरभाष पर संपर्क साधने का प्रयास किया गया, तो दोनों ही आला अधिकारी कॉल का जवाब देने से कतराते नजर आए।
जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारियों का यूं मुंह फेर लेना और मामले पर कोई दंडात्मक कार्रवाई न करना यह साफ दर्शाता है कि इस अनधिकृत कार्यशैली को ऊपर से लेकर नीचे तक का मौन संरक्षण हासिल है। अब देखना यह होगा कि क्या राज्य का वन मंत्रालय और जिला प्रशासन इस पर संज्ञान लेकर इस 'अपवाद' पर पूर्ण विराम लगाता है या वन मंडल यूं ही राम भरोसे चलता रहेगा।






































