वन विभाग का अनोखा जादू: ठग्गांव में 10 करोड़ों खर्च करके उगाए 'कागज़ी पौधे', धरातल पर सिफ़र, भुगतान में अव्वल!



बैकुंठपुर/मनेंद्रगढ़:सरगुजा वन वृत्त के मनेंद्रगढ़ वनमंडल अंतर्गत खड़गवां परिक्षेत्र के ठग्गांव में प्रतिपूरक वृक्षारोपण के नाम पर सरकारी राजस्व की बंदरबांट का एक बड़ा मामला उजागर हुआ है। राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड की 'परसा ओपन कास्ट कोल माइंस' परियोजना के एवज में मिले 10 करोड़ रुपये से अधिक के बजट को ठिकाने लगाने के लिए जो चक्रव्यूह रचा गया, अब उसकी परतें आधिकारिक  ई-ग्रीनवॉच पोर्टल के आंकड़ों से खुलने लगी हैं।  प्लांटेशन के नाम पर इस  खेल में तत्कालीन प्रशिक्षु एसडीओ रहे मयंक सिंह और कार्य सत्यापन अधिकारी सह एसडीओ अवधेश सिंह की कार्यशैली और मार्च तक कराए गए भुगतानों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

पोर्टल के पन्नों पर ₹10.17 करोड़ का आंकड़ा

विभागीय ई-ग्रीनवॉच पोर्टल पर दर्ज आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, ठग्गांव  के सात अलग-अलग पैचों में कुल 201.40 हेक्टेयर रकबे पर सिंचित वृक्षारोपण प्रस्तावित किया गया है। इन कार्यों के लिए स्वीकृत मदवार बजट के आंकड़े इस प्रकार हैं:

 पैच A (15.86 ha): ₹93,80,100.00 स्वीकृत लागत।  

पैच B (22.87 ha): ₹1,23,37,300.00 स्वीकृत लागत।  

पैच C (35.50 ha): ₹1,88,77,900.00 स्वीकृत लागत।  

पैच D (37.78 ha): ₹1,92,36,900.00 स्वीकृत लागत।  

पैच E (54.27 ha): ₹2,94,82,500.00 स्वीकृत लागत (सबसे बड़ा पैच)।  

पैच F (22.43 ha): ₹1,47,57,200.00 स्वीकृत लागत।  

पैच G (12.69 ha): ₹76,57,000.00 स्वीकृत लागत।  

कुल स्वीकृत बजट: ₹10,17,28,900/- (दस करोड़ सत्रह लाख अट्ठाईस हजार नौ सौ रुपये)

कुल रोपे जाने वाले पौधे: 2,01,400 पौध सामग्री (सागौन, बांस, आमला, जामुन आदि)।

मार्च के भुगतानों पर आबोहवा गर्म: मयंक और अवधेश की जोड़ी पर सवाल

सरकारी नियमों के मुताबिक इरिगेटेड प्लांटेशन के तहत फेंसिंग, बोरवेल खनन, ड्रिप/सिंचाई व्यवस्था, मृदा परीक्षण और गड्ढा खुदाई का शत-प्रतिशत भौतिक सत्यापन होना अनिवार्य है। लेकिन सूत्रों का कहना है कि वित्तीय वर्ष के समापन यानी मार्च महीने में बजट खपाने की ऐसी जल्दीबाज़ी दिखाई गई कि नियमों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया।  

मैदानी स्तर पर प्रशिक्षु रेंजर मयंक सिंह की मॉनिटरिंग और एसडीओ अवधेश सिंह द्वारा किए गए कार्य सत्यापन  को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि बिना ज़मीनी मुआयने और बिना गुणवत्ता जांचे, कागजी औपचारिकताओं के दम पर करोड़ों रुपये आहरित कर लिए गए।पोर्टल जहां 10 करोड़ से अधिक की लागत से हरे-भरे सिंचित वनों की तस्वीर प्रस्तुत कर रहा है, वहीं जमीनी स्तर  पर तस्वीरे बिल्कुल अलग दास्तान बयां कर रही हैं। धरातल पर न तो कोई सुदृढ़ सिंचाई व्यवस्था दिखती है और न ही सघन फेंसिंग। केवल गड्ढों की खोदाई और नाममात्र के पौधे रोपड़ करके इतिश्री कर ली गई है।  

निष्पक्ष जांच हुई तो नपेंगे कई बड़े चेहरे

इस पूरे प्लांटेशन की यदि उच्चस्तरीय जांच और मार्च महीने में तक जारी हुए मस्टर रोल, वेंडरों के बिलों और जीपीएस कोऑर्डिनेट्स का भौतिक मिलान कराया जाए, तो वन विभाग के भीतर का यह वित्तीय घाटा और बड़ा रूप ले सकता है। देखना होगा कि विभाग इस करोड़ों के संभावित घोटाले पर निष्पक्ष जांच के आदेश देता है या अधिकारियों की यह जुगलबंदी मामले को ठंडे बस्ते में डालने में कामयाब रहती है।

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