एक विभाग, दो अधिकारी और RTI पर दो अलग राग,कोरिया वन मंडल में सूचना छिपाने का उलझा खेल!


• DFO कार्यालय ने अभिलेखों के अवलोकन हेतु भेजा चालान का बुलावा, तो रेंजर ने  जानकारी स्पष्ट नहीं बताकर फेरा पानी

• एक ही कानून और एक ही विषय पर अफसरों के विरोधाभासी जवाबों से उजागर हुई विभागीय साठगांठ

• जब सूचना के अधिकार पर ही नहीं मिल पा रहे सुर-ताल, तब इनके भरोसे कैसे सुरक्षित रहेगा करोड़ों का वनीकरण?


बैकुंठपुर/
सूचना का अधिकार अधिनियम हर शासकीय विभाग के लिए एक समान लागू होता है, लेकिन कोरिया वन मंडल में अधिकारियों के अपने-अपने अलग नियम-कायदे चलते दिख रहे हैं। एक ही विषय और एक ही प्रकरण से संबंधित जानकारी मांगने पर वन मंडल के मुखिया यानी डीएफओ और उनके अधीनस्थ रेंजर  के जवाबों में  ज़मीन-आसमान का अंतर देखने को मिल रहा है ।

DFO कार्यालय का बुलावा,दस्तावेज मांगे तो थमा दिया अवलोकन और चालान का फरमान

परसा ओपन कास्ट कोल माइंस के संबंध में  स्वीकृत DPR, ग्राम सभा के प्रस्तावों की प्रति और संशोधित आदेशों की प्रमाणित प्रतियां RTI के तहत कोरिया वनमंडल  से मांगी गई थीं। लेकिन DFO कार्यालय ने नियमों को दरकिनार करते हुए आवेदक को दस्तावेज देने की बजाय  मानचित्रकार शाखा में आकर अभिलेखों के अवलोकन और  चालान भरने का फरमान जारी कर दिया। DFO कार्यालय के पत्र पर आवेदक ने लिखित पत्र प्रस्तुत कर स्पष्ट किया, कि मूल आवेदन में अवलोकन की मांग ही नहीं की गई थी, बल्कि स्पष्ट रूप से प्रमाणित प्रतियां मांगी गई थीं। RTI अधिनियम की धारा 7(9) के तहत आवेदक जिस स्वरूप में जानकारी चाहे, उसे उसी रूप में मुहैया कराना अनिवार्य है। चालान बनवाकर अवलोकन के लिए बुलाना साफ जाहिर करता है कि DFO दफ्तर में फाइलें मौजूद और स्पष्ट हैं, फिर भी प्रमाणित प्रतियां जारी न करके जानकारी को टालने और गोलमाल करने का प्रयास किया जा रहा।हैरानी की बात तब सामने आई जब उसी प्रकरण की जानकारी के लिए  वनपरिक्षेत्राधिकारी बैकुंठपुर कार्यालय से जारी पत्र  में यह बहाना बनाकर सीधे इंकार कर दिया कि मांगी गई जानकारी में विशिष्टियों का उल्लेख नहीं है एवं कार्य का नाम स्पष्ट न होने के कारण जानकारी उपलब्ध कराया जाना संभव नहीं है।अब प्रश्न यह उठता है कि जिस आवेदन और कार्य की जानकारी DFO कार्यालय के लिए बिल्कुल स्पष्ट थी और जिसके लिए आवेदक को फीस जमा करके मानचित्रकार शाखा में फाइलें देखने बुलाया गया, वही जानकारी रेंजर के लिए अचानक अस्पष्ट और असंभव कैसे हो गई? एक ही महकमे में सूचना के अधिकार आवेदन पर डीएफओ और रेजर का अलग-अलग राग आलापना समझ से परे है 

करोड़ों के CA प्लांटेशन का सच कैसे आएगा सामने?

जब सूचना के अधिकार जैसे संवेदनशील और पारदर्शी कानून को लेकर एक ही विभाग के अफसरों  के बीच कोई तालमेल नहीं है, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि भीतरखाने किस कदर अव्यवस्था होगी, जब RTI के सामान्य आवेदनों पर अधिकारी अपनी ही बात से मुकर रहे हैं और विरोधाभासी पत्र जारी कर रहे हैं, तब ऐसे बेताल प्रशासनिक अमले के भरोसे करोड़ों रुपये के CA प्लांटेशन पर पारदर्शी की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

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