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बैकुण्ठपुर/कोरिया वन मंडल के वनीकरण कार्यक्रमों में कागजी आंकड़ों और मैदानी वास्तविकताओं के बीच का फासला कम होने का नाम नहीं ले रहा है। CA प्लांटेशन पोड़ी-बचरा क्षेत्र के मुगूम में इन दिनों पौधे लगाने के लिए गड्ढा खुदवाने का काम चल रहा है, जहाँ पसीना बहाने वाले ग्रामीण मजदूरों के सामने मजदूरी की दरें अब भी एक पहेली बनी हुई हैं। वन विभाग की इस कार्यशैली ने एक बार फिर वनांचल के भीतर सुलगते प्रशासनिक सवालों को हवा दे दी है।
मजदूरों की जुबानी- 20 से बढ़कर 25 रुपये या फिक्स 300?
मुगूम क्षेत्र के इस प्लांटेशन काम में जुटे पुरुष और महिला श्रमिकों से जब उनकी दिहाड़ी और मेहनत के मोल पर बात की गई, तो अजीबोगरीब विरोधाभास सामने आया। मजदूरों के मुताबिक 2×2 आकार के एक गड्ढे की खुदाई के एवज में उन्हें पहले 20 रुपये देने की बात कही गई थी, जिसे अब बढ़ाकर 25 रुपये प्रति गड्ढा किए जाने की चर्चा है। वहीं, कुछ अन्य श्रमिकों ने बताया कि उन्हें रोजाना के हिसाब से 300 रुपये मजदूरी देने कहा गया है। एक ही कार्यस्थल पर दरों को लेकर इस तरह के अलग-अलग दावे यह बताने के लिए काफी हैं कि वन विभाग का कामगारों के प्रति कितना लचर रवैया है।
सूचना पट्ट नदारद, भ्रम के बीच पसीना बहा रहे ग्रामीण
शासकीय नियमों की बात करे तो किसी भी वन विकास अथवा वनीकरण स्थल पर काम शुरू होने से पहले एक स्पष्ट सूचना पट्ट लगाया जाना अनिवार्य होता है। बोर्ड पर कार्य का नाम, कुल लागत, पौधों की संख्या और दैनिक मजदूरी दर का ब्योरा दर्ज होना चाहिए ताकि काम करने वाले हर मजदूर को उसका अधिकार पता हो। लेकिन बारी के बाद मुगूम के इस स्थान पर ऐसा कोई बोर्ड दूर-दूर तक नजर नहीं आता। बोर्ड न होने के कारण वहां काम करने वाले ग्रामीण अंधेरे में तीर चलाने को मजबूर हैं।
बारी के बाद मुगूम: वही ढर्रा, वही लापरवाही
कोरिया वन मंडल के भीतर CA प्लांटेशन कार्यों में अनियमितता का यह कोई पहला वाकया नहीं है। इससे पहले पोड़ी-बचरा के ही 'बारी' प्लांटेशन में गड्ढा खुदाई के दौरान बरती गई अनियमितता खूब सुर्खियों में रही थीं। उस दौरान घनी झाड़ियों के बीच गड्ढे खुदवाने और दो गड्ढों के बीच की निर्धारित न्यूनतम दूरी के मानकों और कम मजदूरी दर के मामले सामने आए थे। अब मुगूम में नाम मात्र की झाड़ी कटाई के बीच वही पुरानी पटकथा दोहराई जा रही है।
करोड़ों रुपये के इन प्लांटेशन प्रोजेक्ट्स में मजदूरी दरों के फेर और पन्ने पलटने में वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी आखिर क्यों पर्दा डाले बैठे हैं? मस्टररोल के वास्तविक आंकड़े छिपाने की यह कला किस मजबूरी के तहत उपजी है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल भुगतान की प्रक्रिया होना बाकी है, और सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि वन विभाग अंततः किस दर से मजदूरों को पारिश्रमिक का भुगतान करता है।








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