बैकुंठपुर (कोरिया, छत्तीसगढ़)
वक्त भले ही बदल जाए और आधुनिक गाड़ियों का दौर आ जाए, लेकिन कुछ तस्वीरें ऐसी होती हैं जो सीधा अतीत के उस सुनहरे दौर में ले जाती हैं जहाँ सादगी, मजबूती और रुतबे की अपनी अलग ही पहचान हुआ करती थी। कोरिया जिले में विश्राम फरमा रही सफेद रंग की हिंदुस्तान एम्बेस्डर आज भी उस दौर की गरिमा और शानदार यादों को अपने आप में समेटे हुए है।
अतीत का वह रसूखदार दौर
एक जमाना था जब भारतीय सड़कों पर एम्बेसेडर का राज हुआ करता था। यह सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीति और सामाजिक गौरव का प्रतीक थी। कलेक्टर, एसपी, मंत्री और उच्चाधिकारियों की पसंदीदा सवारी रही इस गाड़ी की छत पर लगी बत्ती और इसकी कतारबद्ध आवाजाही सत्ता और सम्मान की पहचान मानी जाती थी। जब यह कार अपनी खास गड़गड़ाहट और धमक के साथ सड़कों से गुजरती थी, तो हर किसी की निगाहें इसकी ओर टिक जाती थीं।
प्रकृति के सानिध्य में बीते दिनों की यादें
कोरिया जिले की हरियाली और पेड़ों की छांव के बीच खड़ी यह एम्बेसेडर कार आज प्रकृति के आगोश में एक शांत पहरेदार की तरह नजर आती है। कार पर लिपटी हरी-भरी लताएं और पत्तियां ऐसा अहसास कराती हैं मानो समय ने इसे एक यादगार स्मारक का रूप दे दिया हो। इसके पिछले हिस्से पर लगा भारत स्टेज-II का मार्क और पुराना रजिस्ट्रेशन नंबर आज भी उन बीते पन्नों को जिंदा करता है जब कोरिया के विकास और प्रशासनिक निर्णयों की गवाह यही एम्बेसेडर हुआ करती थी।
एक अनमोल ऐतिहासिक धरोहर
1950 के दशक से लेकर दशकों तक देश की सड़कों पर एकछत्र राज करने वाली एम्बेसेडर को यूं ही 'किंग ऑफ इंडियन रोड्स' नहीं कहा जाता था। इसका विशाल सोफे जैसा कम्फर्ट, मजबूत बॉडी और रॉयल लुक हर भारतीय के दिल में खास जगह रखता था। आज कोरिया में मौजूद यह गाड़ी भले ही शांत खड़ी हो, लेकिन इसके दर्शन मात्र से ही उस दौर की गरिमा, सादगी और वीआईपी संस्कृति के दिन आंखों के सामने जीवंत हो उठते हैं।
यह गाड़ी मात्र एक धातु का ढांचा नहीं, बल्कि कोरिया जिले के प्रशासनिक इतिहास और हमारे अतीत की एक बेहद खूबसूरत और अनमोल यादगार है।








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