'पोड़ी बचरा' CA प्लांटेशन के करोड़ों के बजट पर अफसरों की नजर'!

परसा ओपन कास्ट कोल माइंस के एवज में मिले भारी-भरकम फंड को 'खपाने' की होड़; डीएफओ की वापसी या एसडीओ का'गृह प्रेम'?




बैकुंठपुर/कोरिया:परसा ओपन कास्ट कोल माइंस के एवज में कोरिया वन मंडल के बैकुंठपुर वन परिक्षेत्र अंतर्गत 'पोड़ी बचरा में स्वीकृत हुआ क्षतिपूरक वनीकरण (CA Plantation) का करोड़ों का प्रोजेक्ट अब हरियाली लाने के बजाय अफसरों की 'अवैध कमाई' का जरिया बनता नजर आ रहा है। बोल बच्चन न्यूज के लगातार खुलासों के बाद अब विभागीय गलियारों में इस बात की चर्चा आम है कि आखिर क्यों इस वन मंडल में कुछ खास अधिकारियों और कर्मचारियों का जमावड़ा अचानक बढ़ गया है।

करोड़ों का प्रोजेक्ट और 'जुगाड़' से वापसी की पटकथा

सूत्रों के मुताबिक, कोरिया वनमंडल के डीएफओ की इस वन मंडल में दोबारा पदस्थापना होना महज एक इत्तेफाक नहीं है। बताया जा रहा है कि डीएफओ को पहले से ही भली-भांति जानकारी थी कि परसा माइंस के एवज में 'इंटीग्रेटेड CA प्लांटेशन' का करोड़ों रुपये का बजट कोरिया वन मंडल में ही खर्च किया जाना है। इसी भारी-भरकम राशि को 'साधने' के लिए कथित तौर पर रसूख और जुगाड़ के दम पर दोबारा कोरिया में पोस्टिंग कराई गई।अगर इन दावों पर तनिक भी सच्चाई है तो  निश्चित ही शासन के स्थानांतरण नीति के सामने जुगाड़ की यह नीति ज्यादा कारगर साबित हो रहा है।






'गृह वन मंडल' का मोह या CA प्लांटेशन पर नजर?

इस पूरे खेल में सबसे अहम और चर्चित किरदार के रूप में एसडीओ के.एस. कंवर का नाम उभरकर सामने आ रहा है। कभी इसी कोरिया वन मंडल में रेंजर के पद पर तैनात रहे कंवर साहब, पदोन्नति के बाद अन्य जिलों में अपनी सेवाएं दे रहे थे। लेकिन जैसे ही 'पोड़ी बचरा' के करोड़ों के CA फंड की मंजूरी की भनक लगी, वे भी अपने 'गृह वन मंडल' बैकुंठपुर लौटने से खुद को रोक नहीं पाए।चर्चा तो यहां तक है कि कंवर साहब ने एड़ी-चोटी का जोर लगाकर बैकुंठपुर में एसडीओ के रूप में अपनी वापसी पक्की की। इतना ही नहीं, जिस मुगूम बारी पैच में यह काम चल रहा है, वहां खुद को 'स्थानीय' बताकर मजदूरों के विरोध और धरातलीय बदहाली को दबाने  का जिम्मा भी इन्होंने ही संभाल रखा है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर एक प्रशासनिक अधिकारी का यह 'अति-उत्साह' जंगलों को बचाने के लिए है या फिर करोड़ों के बजट में अपनी हिस्सेदारी तय करने के लिए?

 रिटायर कर्मचारी और चहेते भी मैदान में

सेवानिवृत्ति के बावजूद कार्यालय की कुर्सियों पर जमे मानचित्रकार और विभाग के 'स्वघोषित शुभचिंतक'की जुगलबंदी ने पूरे मामले को संदिग्ध बना दिया है।करोड़ों के प्रोजेक्ट का कार्य बिना किसी आगामी तैयारी  के बेमौशम शुरूवात करा देना कई सवाल खड़े करता है, प्लांटेशन के नाम पर सिर्फ गढ्ढे की खुदाई कर भारी भरकम राशि आहरण होने के अंदेशों से इंकार नहीं किया जा सकता। जरूरत है कि प्रोजेक्ट अनुसार वृक्षारोपण का कार्य कैसे हो सके।लेकिन जिस प्रकार से करोड़ों के इस वृक्षारोपण प्रोजेक्ट को हरियाली  के नाम पर विभागीय अधिकारी पलीता लगाने प्रयास कर रहे है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि हरियाली के नाम पर सिर्फ और सिर्फ प्रोजेक्ट से जुड़े लोग ही असल हरियाली का मजा ले सकेंगे।

गौरतलब है कि उक्त CA प्लांटेशन में मजदूरों से ₹20 प्रति गड्ढे की मामूली दर पर कार्य कराने  की बात सामने आई थी।बाद में मजदूरों के विरोध और काम रोकने के बाद बढ़ता विवाद देख विभागीय अधिकारी लोक लुभावन देकर फिर से काम शुरू कराये।बता दे कि गड्ढा खुदाई कार्य जिस पैच में कराया जा रहा है वहां बिना किसी तैयारी के ही डीएफओ कोरिया के निगरानी में कार्य कराया जा रहा है।कोरिया वनमण्डल के डीएफओ  और उनके मातहत अधिकारियों और कर्मचारियों के द्वारा नियम-विरुद्ध तरीके से बारिश के दिनों से ही आनन-फानन में गढ्ढे की खुदाई कराकर केवल औपचारिकताओं की पूर्ति की जा रही है। इससे साफ जाहिर है कि अफसरों की इस तिकड़ी और उनके सिंडिकेट को लगने वाले पौधो को जिंदा रखने से कोई सरोकार नहीं है, इनका एकमात्र मकसद है कि,सिर्फ कागजों पर पौधरोपण दर्शाकर करोड़ों के सरकारी खजाने को किस प्रकार  से अपनी जेबों में भर सकें।बड़ा सवाल यह है किक्या शासन-प्रशासन और वन विभाग के उच्च अधिकारी इस 'जुगाड़ू सिंडिकेट' की मंशा और पोड़ी बचरा CA प्लांटेशन में पनप रहे इस बड़े घोटाले पर संज्ञान लेंगे, या फिर  मनमाफिक हो रहे  कार्यों पर गांधारी की तरह आँखो  पर  पट्टी बांध कर तमाशा देखेंगे।

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