टेंडर अभी खुला नहीं, फिर कार्यस्थल पर फेंसिंग पोल
विश्वस्त सूत्रों और मैदानी पड़ताल से मिली जानकारी के अनुसार, कोरिया वन मंडल अंतर्गत CA प्लांटेशन क्षेत्रों की सुरक्षा फेंसिंग के लिए प्रयुक्त होने वाले आरसीसी पोल की खरीद हेतु शासकीय 'जेम' (GeM) पोर्टल पर अभी टेंडर प्रक्रियाधीन ही है। नियमों के मुताबिक जब तक टेंडर प्रक्रिया पूरी होकर संबंधित फर्म को कार्यादेश जारी न हो जाए, तब तक कार्यस्थल पर किसी भी सामग्री का पहुंचना पूरी तरह गैर-कानूनी और नियम-विरुद्ध है। लेकिन धरातल की हकीकत यह है कि टेंडर खुलने से पहले ही CA प्लांटेशन स्थलों पर फेंसिंग पोल पहुंचने की कि चर्चा हैं।
विभागीय गलियारों में तैरती खबरों की मानें तो कोरिया वमंडल के किसी पूर्ववर्ती निर्माण अथवा वनीकरण कार्य के लिए क्रय किए गए फेंसिंग पोल का उपयोग होना शेष रह गया था। विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने कथित तौर पर मौखिक आदेशों पर उन पुराने पोलों को उठाकर CA प्लांटेशन स्थल पर शिफ्ट करवाने की बात सामने आ रही है।इस दशा में बड़ा सवाल उठता है कि,स्थानांतरित कराए गए ये आरसीसी पोल मूलतःकिस योजना, किस बीट और किस कक्ष क्रमांक के लिए खरीदे गए थे? स्वीकृत स्थल पर इनका उपयोग क्यों नहीं हुआ और इन्हें वहां से हटाने संबंधी भौतिक सत्यापन की विभागीय रिपोर्ट कहाँ है? वहीं जब CA प्लांटेशन का पृथक से भारी-भरकम बजट स्वीकृत है, जिसमें झाड़ी कटाई से लेकर घेराबंदी तक हर काम की राशि तय है, तो फिर दूसरे मद के सामान को यहाँ खपाने की हड़बड़ी क्यों मचाई जा रही है?
DFO के पूर्व पदस्थापना के दौरान'खास' सप्लायरों का गठजोड़?
सूत्रों का दावा तो यह भी है कि वर्तमान में पदस्थ वनमंडलाधिकारी के पूर्व पदस्थापना क्षेत्र के पसंदीदा सप्लायरों के इशारे पर ही यह सामग्री नियम-विरुद्ध तरीके से कार्यस्थल पर भिजवाई गई है। हालांकि, इस दावे की अंतिम प्रामाणिकता विभागीय जांच और दस्तावेजी साक्ष्यों से ही तय होगी, लेकिन यदि आगामी टेंडर का आवंटन इत्तेफाक से उसी क्षेत्र या चहेते सप्लायर को हो जाता है, तो इस पूरे पर्दे के पीछे चल रहे सिंडिकेट का भंडाफोड़ खुद-ब-खुद हो जाएगा।
गौरतलब है कि,एक तरफ CA प्लांटेशन में 20और25 रुपये प्रति गड्ढा या 300 रुपये दिहाड़ी का भ्रम फैलाकर मजदूरों के पसीने का मोल छुपाया जा रहा है, दूसरी तरफ अब टेंडर से पहले सामग्री की नियम विरुद्ध सप्लाई ने साबित कर दिया है कि कोरिया वन मंडल में नियमों और वित्तीय पारदर्शिता की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। देखना यह होगा कि इस फॉलो-अप रिपोर्ट के बाद उच्चाधिकारी गहरी नींद से जागते हैं या फिर कागजी लिपा-पोती कर करोड़ों के इस खेल को रफा-दफा कर दिया जाता है।








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