कोरिया वन मंडल में अफसरशाही का तानाशाही रवैया: DFO परदेशी के आने के बाद संवाद हीनता चरम पर, नाक के नीचे चल रहा फर्जी मस्टररोल का खेल!


• आगंतुकों से परहेज और फोन उठाने से तौहीन? अड़ियल रवैये के बीच वनांचल में फल-फूल रहा भ्रष्टाचार का सिंडिकेट!
• सोनहत और देवगढ़ परिक्षेत्र में रिश्तेदारों के नाम पर फर्जी हाजिरी: सरकारी खजाने से लंबे समय से हो रहा अवैध आहरण
• ई-कुबेर के बाद अब फर्जी मस्टररोल बना काली कमाई का जरिया, क्या करोड़ों के CA प्लांटेशन में भी दोहराया जाएगा वही पुराना ढर्रा?



बैकुंठपुर/कोरिया वन मंडल में दोबारा पदस्थ  वनमंडलाधिकारी  चंद्रशेखर शंकर सिंह परदेशी के आने के बाद से वन महकमे के भीतर प्रशासनिक कार्यशैली और पारदर्शिता की धज्जियां उड़ती साफ नजर आ रही हैं। एक तरफ जहां कार्यालय में अपनी अड़ियल छवि और आगंतुकों से दूरी बनाने के रवैये को लेकर DFO साहब लगातार चर्चाओं में हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके ठीक नाक के नीचे मैदानी अमला और विभागीय कर्मचारी बेखौफ होकर फर्जीवाड़े की इबारत लिख रहे हैं। अगर अफसरशाही का यह 'एटीट्यूड' विभाग के वास्तविक मैदानी कार्यों के निरीक्षण में दिखा होता, तो शायद वनांचल क्षेत्रों में चल रहा फर्जी मस्टररोल का यह संगठित खेल कब का बेनकाब हो चुका होता।

सोनहत और देवगढ़ में रिश्तेदारों के नाम फर्जी हाजिरी का बड़ा खेल

चौंकाने वाला मामला वनांचल क्षेत्र सोनहत और देवगढ़ वन परिक्षेत्र से जुड़ा सामने आ रहा है। सूत्र बताते हैं कि यहां पदस्थ मैदानी अधिकारी और कर्मचारी अपने सगे-संबंधियों, नाते-रिश्तेदारों और कागजी नामों के सहारे लंबे समय से फर्जी मस्टररोल तैयार कर शासकीय राशि का धड़ल्ले से आहरण कर रहे हैं। जिस जगह मजदूर पसीना बहाते तक नहीं, वहां कागजों पर फर्जी हाजिरी लगाकर सरकारी खजाने को चूना लगाया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि सालों से जारी इस फर्जीवाड़े की भनक क्या आला अधिकारियों को नहीं थी, या फिर जानबूझकर आंखें मूंदकर इस सिंडिकेट को फलने-फूलने का अभयदान दिया जाता रहा?

संवादहीनता और तानाशाही: फोन का जवाब न देना बना दिनचर्या

विभाग के उच्च पद पर बैठे अधिकारी का जनता, जनप्रतिनिधियों और मीडिया के प्रति रवैया कितना लचर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दफ्तर में आगंतुकों से मिलना तो दूर, फोन पर उठने वाले सवालों का जवाब देना भी उनकी प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि यदि इस एटीट्यूड का आधा हिस्सा भी वनीकरण, प्लांटेशन और बजट आहरण की मैदानी जांच में लगाया गया होता, तो विभाग को शर्मसार करने वाले इन फर्जी मस्टररोल गिरोहों की जगह सलाखों के पीछे होती।

ई-कुबेर के बाद फर्जी मस्टररोल बना अवैध कमाई का नया जरिया!

विभागीय गतिविधियों की पड़ताल करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि वन विभाग में ई-कुबेर प्रणाली के कड़े नियंत्रण के बाद अब निचले से लेकर ऊपरी स्तर तक अवैध कमाई का सबसे महफूज और आसान जरिया 'फर्जी मस्टररोल' को बना लिया गया है। फर्जी मजदूरों के नाम पर स्वीकृत कराई गई राशि किसके-किसके खातों में जा रही है और इसका कितना कमीशन किस-किस कुर्सी तक पहुंच रहा है यह निष्पक्ष जांच का बड़ा विषय है।

क्या CA प्लांटेशन में भी चलेगा  पुराने अंदाज वाला फर्जीवाड़ा?

वर्तमान में पोड़ी बचरा,  क्षेत्रों में CA प्लांटेशन का काम चल रहा है, जहां पहले से ही सूचना पट्ट नदारद रहने और 25 रुपये प्रति गड्ढा या 300 रुपये दिहाड़ी को लेकर मजदूरों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। सोनहत और देवगढ़ के इस खुले भंडाफोड़ के बाद अब सबसे बड़ा संशय यह खड़ा हो गया है कि क्या करोड़ों के इस CA प्लांटेशन प्रोजेक्ट को भी फर्जी मस्टररोल के उसी पुराने ढर्रे पर निपटाया जाएगा? या फिर इस बार कागजी मजदूरों की जगह धरातल पर काम करने वाले वास्तविक  मजदूरों को उनका हक मिलेगा?अब देखना यह होगा कि  जिम्मेदार महकमा गहरी नींद से जागकर सोनहत और देवगढ़ के फर्जी मस्टररोल सिंडिकेट पर जांच बैठाता है, या फिर DFO साहब की खामोशी इस पूरे खेल को संरक्षण देती रहेगी।

ग्रामीण अंचलों में शारदीय नवरात्रि की गूँज: अमहर, सिंदिया और करजी समेत कई पंडालों में पहुँचे अशोक जायसवाल, माँ दुर्गा का लिया आशीर्वाद


कोरिया / शारदीय नवरात्रि के पावन और पवित्र अवसर पर कोरिया जिले के विभिन्न ग्रामीण पंचायतों में भक्ति और उल्लास का अनूठा माहौल देखने को मिल रहा है। इसी क्रम में पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष, जिला कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष एवं समाज सेवक अशोक जायसवाल ने ग्रामीण क्षेत्रों के कई प्रमुख दुर्गा पूजा पंडालों का दौरा किया।

उन्होंने शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर अमहर, सिंदिया, करजी, गिरजापुर, कटकोना, पुटा और अंगा सहित अनेक दुर्गा पूजा पंडालों में पहुंचकर जगतजननी माँ दुर्गा के दर्शन किए और विधि-विधान से पूजन-अर्चन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। इस पावन अवसर पर उन्होंने माँ दुर्गा से प्रार्थना की कि वे समस्त ग्रामवासियों के जीवन में सुख, समृद्धि, शांति और खुशहाली हमेशा बनाए रखने  की कामना की।

इस दौरान अशोक जायसवाल ने ग्रामवासियों से आत्मीय भेंट कर उन्हें शारदीय नवरात्रि की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ दीं। ग्रामीण अंचलों में भी अद्भुत भक्ति-भाव देख हर किसी का मन को प्रफुल्लित उठा।इस धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन मेंरामकृष्ण शाहू, विजय सिंह,राजू भगत,लालदास महंत और जनप्रतिनिधि विशेष रूप से उपस्थित रहे।

दुर्गा पूजा पंडालों व जगराता में पहुँचे अशोक जायसवाल, माँ दुर्गा के दर्शन कर क्षेत्रवासियों की सुख-समृद्धि की माँगी दुआएँ



कोरिया/बैकुंठपुर:शारदीय नवरात्रि की पावन और पवित्र तिथियों के अवसर पर कोरिया जिले के विभिन्न दुर्गा पूजा पंडालों में भक्ति और उल्लास का अद्भुत माहौल देखने को मिल रहा है। इसी क्रम में पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष एवं जिला कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष व समाज सेवक अशोक जायसवाल ने जिले के कई प्रमुख दुर्गा पूजा पंडालों में पहुंचकर जगतजननी माँ दुर्गा के दर्शन किए और विधि-विधान से पूजन-अर्चन कर क्षेत्रवासियों के लिए सुख-समृद्धि की कामना की।

शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर जहाँ पंडालों में रंग-बिरंगी जगमगाती रोशनियाँ, गूँजते 'जय माता दी' के जयकारे और सड़कों पर उमड़े भक्ति के विशाल जनसैलाब ने हर किसी का मन मोह लिया। हर पंडाल की अनूठी छटा और श्रद्धालुओं का उत्साह वातावरण को अद्भुत सकारात्मक ऊर्जा और शांति से भर देने वाला था। इस दौरान श्री जायसवाल  ने समस्त आयोजकों और क्षेत्रवासियों को शारदीय नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं दीं।

इससे पूर्व, जिले के विभिन्न स्थानों पर आयोजित भव्य जगराता कार्यक्रमों में भी अशोक जायसवाल मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए जिसमें दुर्गा पूजा आयोजन समिति, खरवट चेरवापारा, बैकुंठपुर शामिल रहा। यहां सरगुजा के प्रसिद्ध जसगीत सम्राट लोक गायक एम.डी. महंत एवं लोक गायिका तारा देवांगन द्वारा अपनी शानदार प्रस्तुति दी गई। उनके भक्ति गीतों ने पंडाल में उपस्थित सभी भक्तों को झूमने पर मजबूर कर दिया।

पूर्व नगर पालिका  अध्यक्ष के विभिन्न आयोजनों में पहुँचने पर आयोजन समितियों के सदस्यों और स्थानीय युवाओं द्वारा उनका आत्मीय और जोरदार स्वागत किया गया।कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में अशोक जायसवाल ने कहा कि "सच्ची भक्ति समाज को आपस में जोड़ती है। दुर्गा पूजा का यह महापर्व हमें एकता, सद्भाव और सेवा का अनमोल संदेश देता है।" उन्होंने माता शेरावाली से प्रार्थना की कि वे समूचे प्रदेशवासियों और क्षेत्रवासियों को सुख, शांति, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य का वरदान प्रदान करें।

रायपुर : सीएम हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायतों के निराकरण को लेकर शासन गंभीर शिकायतों को बिना सारगर्भित टीप के बंद किए जाने पर पीडब्लूडी के 13 अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस विभाग ने 15 दिनों में मांगा जवाब

 

 


रायपुर,17 अक्टूबर 2026/नागरिकों द्वारा सीएम हेल्पलाइन-1076 पर दर्ज कराई गई शिकायतों के समाधान को लेकर राज्य शासन बेहद गंभीर है। पोर्टल पर दर्ज शिकायतों का संबंधित विभागों द्वारा सक्रियता और गंभीरता से निराकरण किया जा रहा है। लोक निर्माण विभाग ने सीएम हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायतों के असंतोषप्रद समाधान और लापरवाही पर 13 अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इनमें तीन अधीक्षण अभियंता, पांच कार्यपालन अभियंता और पांच अनुविभागीय अधिकारी शामिल हैं।


सीएम हेल्पलाइन में दर्ज शिकायतों को बिना सारगर्भित टीप के बंद किए जाने के कारण लोक निर्माण विभाग द्वारा अधिकारियों के विरुद्ध ये कार्रवाई की गई है। सीएम हेल्पलाइन पोर्टल पर विगत दो महीनों अगस्त और सितम्बर माह में लोक निर्माण विभाग से संबंधित शिकायतों की समीक्षा में पाया गया कि एल-1, एल-2 और एल-3 स्तर पर शिकायतों को ऐसी टीप के साथ बंद किया गया है, जो शिकायत का समाधान नहीं दर्शाती है।


विभाग ने एल-1 स्तर पर शिकायतों के असंतोषप्रद समाधान पर राष्ट्रीय राजमार्ग उप संभाग बिलासपुर के अनुविभागीय अधिकारी श्री अतुल राज पेगवार, बेमेतरा उप संभाग के अनुविभागीय अधिकारी श्री राजेश कुमार बाजपेयी, पेंड्रा उप संभाग के अनुविभागीय अधिकारी श्री जगदीश प्रसाद, सेतु उप संभाग दुर्ग के अनुविभागीय अधिकारी श्री अशोक कुमार हरियाले और पाटन उप संभाग की अनुविभागीय अधिकारी श्रीमती सोनल ढालेन्द्र को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।


एल-2 स्तर पर शिकायतों के उचित निराकरण नहीं होने पर विभाग द्वारा बेमेतरा संभाग के कार्यपालन अभियंता  केशव प्रसाद लहरे, कोरबा संभाग के कार्यपालन अभियंता  घासीराम जांगड़े, राष्ट्रीय राजमार्ग संभाग बिलासपुर के कार्यपालन अभियंता  रोशन कुमार साहू, सारंगढ़ संभाग के कार्यपालन अभियंता  प्यारे लाल पैकरा और कांकेर संभाग की कार्यपालन अभियंता श्रीमती प्रज्ञा नंद को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। 


इसी प्रकार से सीएम हेल्पलाइन में दर्ज शिकायतों को एल-3 स्तर पर बिना सारगर्भित टीप के बंद किए जाने पर मंडल क्रमांक-2, रायपुर के अधीक्षण अभियंता  डी.के. नेताम, दुर्ग मंडल की अधीक्षण अभियंता श्रीमती अर्पणा चौरपगार तथा राष्ट्रीय राजमार्ग मंडल बिलासपुर के अधीक्षण अभियंता  महादेव लहरे को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।


राज्य शासन ने इन अधिकारियों को जारी कारण बताओ नोटिस में कहा है कि शिकायत बंद करते समय यह अपेक्षित है कि टीप में स्थल निरीक्षण के निष्कर्ष, की गई या प्रस्तावित कार्यवाही, उसकी तिथि या समय-सीमा एवं शिकायतकर्ता को दी गई सूचना का स्पष्ट उल्लेख हो। यदि शिकायत अन्य विभाग से संबंधित हो तो उसका कारण सहित उल्लेख हो। ऐसा नहीं पाए जाने पर टीप से नागरिकों की समस्या का निराकरण नहीं हुआ तथा पोर्टल पर निराकरण के आँकड़े भ्रामक हुए। 


लोक निर्माण विभाग ने इसे कर्त्तव्य पालन में लापरवाही और पदीय कर्त्तव्यों का सही ढंग से निर्वहन नहीं किया जाना मानते हुए संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। अधिकारियों को अपना लिखित प्रतिवाद नोटिस मिलने के 15 दिनों की समयावधि में लोक निर्माण विभाग के सचिव को प्रस्तुत करने कहा गया है। लिखित प्रतिवाद निर्धारित समयावधि में प्राप्त नहीं होने पर अधिकारियों के विरूद्ध एकपक्षीय कार्यवाही की जाएगी।

वन विभाग में ठेका पद्धति पर छिड़ा संग्राम: क्या बढ़ेगा भ्रष्टाचार या आएगी पारदर्शिता? कर्मचारियों ने खोला मोर्चा


कोरिया/छत्तीसगढ़ वन कर्मचारी संघ ने जंगलों और वन क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही ठेका प्रथा तथा मैदानी कर्मचारियों के अधिकारों में कटौती को लेकर शासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। संघ के प्रदेश अध्यक्ष अजीत दुबे द्वारा हस्ताक्षरित मांग पत्र में शासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए वन विभाग के मैदानी अमले के हितों की रक्षा की अपील की गई है। संघ ने स्पष्ट किया है कि यदि उनकी जायज मांगों पर शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया, तो प्रदेश भर के वन कर्मचारी चरणबद्ध आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।  

ज्ञापन में संघ ने मांग की है कि,जंगलों के भीतर और बाहर होने वाले समस्त निर्माण एवं वानिकी कार्यों (जैसे रपटा निर्माण, पुल-पुलिया निर्माण, सीसी रोड, मुरम रोड, वन मार्गों का रखरखाव, जल संरक्षण कार्य) में ठेका पद्धति को तत्काल बंद किया जाए। ये सभी कार्य केवल वन विभाग के मैदानी कर्मचारियों के माध्यम से ही कराए जाएं। और यदि शासन किसी कार्य को ठेका पद्धति से कराता भी है, तो उसकी गुणवत्ता, माप, मूल्यांकन और तकनीकी मानकों की पूरी जिम्मेदारी ठेकेदार और सक्षम अधिकारियों की हो। किसी भी गड़बड़ी या गुणवत्ता में कमी के लिए वनरक्षक, वनपाल व अन्य लिपिकीय कर्मचारियों को बलि का बकरा न बनाया जाए।  

संघ ने यह भी मांग की है कि,मैदानी कर्मचारियों के पारंपरिक कार्यक्षेत्र और अधिकारों को सीमित करने या उन्हें विभागीय कार्यों से अलग-थलग करने संबंधी निर्णयों पर रोक लगाई जाए। संघ के अनुसार, मैदानी अमला वन विभाग की रीढ़ है, इसलिए उन्हें आवश्यक संसाधन और स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।संघ का मानना  है कि, विभागीय कार्यों को मैदानी अमले से कराने पर न केवल संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर वनवासियों के लिए रोजगार के अवसर भी सुरक्षित रहेंगे।  

बता दें कि, वन विभाग में जंगलों के भीतर और बाहर होने वाले विकास व निर्माण कार्यों के लिए लागू 'ठेका पद्धति' को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। एक तरफ जहां शासन इसे आधुनिकता, पारदर्शिता और गुणवत्ता सुधारने का जरिया मान रहा है, वहीं दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ वन कर्मचारी संघ ने इसे भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला और मैदानी अमले के अधिकारों पर डाका डालने वाला फैसला करार देते हुए चरणबद्ध आंदोलन की चेतावनी दे दी है। 


वन विभाग का अनोखा जादू: ठग्गांव में 10 करोड़ों खर्च करके उगाए 'कागज़ी पौधे', धरातल पर सिफ़र, भुगतान में अव्वल!



बैकुंठपुर/मनेंद्रगढ़:सरगुजा वन वृत्त के मनेंद्रगढ़ वनमंडल अंतर्गत खड़गवां परिक्षेत्र के ठग्गांव में प्रतिपूरक वृक्षारोपण के नाम पर सरकारी राजस्व की बंदरबांट का एक बड़ा मामला उजागर हुआ है। राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड की 'परसा ओपन कास्ट कोल माइंस' परियोजना के एवज में मिले 10 करोड़ रुपये से अधिक के बजट को ठिकाने लगाने के लिए जो चक्रव्यूह रचा गया, अब उसकी परतें आधिकारिक  ई-ग्रीनवॉच पोर्टल के आंकड़ों से खुलने लगी हैं।  प्लांटेशन के नाम पर इस  खेल में तत्कालीन प्रशिक्षु एसडीओ रहे मयंक सिंह और कार्य सत्यापन अधिकारी सह एसडीओ अवधेश सिंह की कार्यशैली और मार्च तक कराए गए भुगतानों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

पोर्टल के पन्नों पर ₹10.17 करोड़ का आंकड़ा

विभागीय ई-ग्रीनवॉच पोर्टल पर दर्ज आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, ठग्गांव  के सात अलग-अलग पैचों में कुल 201.40 हेक्टेयर रकबे पर सिंचित वृक्षारोपण प्रस्तावित किया गया है। इन कार्यों के लिए स्वीकृत मदवार बजट के आंकड़े इस प्रकार हैं:

 पैच A (15.86 ha): ₹93,80,100.00 स्वीकृत लागत।  

पैच B (22.87 ha): ₹1,23,37,300.00 स्वीकृत लागत।  

पैच C (35.50 ha): ₹1,88,77,900.00 स्वीकृत लागत।  

पैच D (37.78 ha): ₹1,92,36,900.00 स्वीकृत लागत।  

पैच E (54.27 ha): ₹2,94,82,500.00 स्वीकृत लागत (सबसे बड़ा पैच)।  

पैच F (22.43 ha): ₹1,47,57,200.00 स्वीकृत लागत।  

पैच G (12.69 ha): ₹76,57,000.00 स्वीकृत लागत।  

कुल स्वीकृत बजट: ₹10,17,28,900/- (दस करोड़ सत्रह लाख अट्ठाईस हजार नौ सौ रुपये)

कुल रोपे जाने वाले पौधे: 2,01,400 पौध सामग्री (सागौन, बांस, आमला, जामुन आदि)।

मार्च के भुगतानों पर आबोहवा गर्म: मयंक और अवधेश की जोड़ी पर सवाल

सरकारी नियमों के मुताबिक इरिगेटेड प्लांटेशन के तहत फेंसिंग, बोरवेल खनन, ड्रिप/सिंचाई व्यवस्था, मृदा परीक्षण और गड्ढा खुदाई का शत-प्रतिशत भौतिक सत्यापन होना अनिवार्य है। लेकिन सूत्रों का कहना है कि वित्तीय वर्ष के समापन यानी मार्च महीने में बजट खपाने की ऐसी जल्दीबाज़ी दिखाई गई कि नियमों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया।  

मैदानी स्तर पर प्रशिक्षु रेंजर मयंक सिंह की मॉनिटरिंग और एसडीओ अवधेश सिंह द्वारा किए गए कार्य सत्यापन  को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि बिना ज़मीनी मुआयने और बिना गुणवत्ता जांचे, कागजी औपचारिकताओं के दम पर करोड़ों रुपये आहरित कर लिए गए।पोर्टल जहां 10 करोड़ से अधिक की लागत से हरे-भरे सिंचित वनों की तस्वीर प्रस्तुत कर रहा है, वहीं जमीनी स्तर  पर तस्वीरे बिल्कुल अलग दास्तान बयां कर रही हैं। धरातल पर न तो कोई सुदृढ़ सिंचाई व्यवस्था दिखती है और न ही सघन फेंसिंग। केवल गड्ढों की खोदाई और नाममात्र के पौधे रोपड़ करके इतिश्री कर ली गई है।  

निष्पक्ष जांच हुई तो नपेंगे कई बड़े चेहरे

इस पूरे प्लांटेशन की यदि उच्चस्तरीय जांच और मार्च महीने में तक जारी हुए मस्टर रोल, वेंडरों के बिलों और जीपीएस कोऑर्डिनेट्स का भौतिक मिलान कराया जाए, तो वन विभाग के भीतर का यह वित्तीय घाटा और बड़ा रूप ले सकता है। देखना होगा कि विभाग इस करोड़ों के संभावित घोटाले पर निष्पक्ष जांच के आदेश देता है या अधिकारियों की यह जुगलबंदी मामले को ठंडे बस्ते में डालने में कामयाब रहती है।

अक्षय ऊर्जा से रोशन हुआ अनिल शर्मा का घर, प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना से शून्य हुआ बिजली बिल



कोरिया/ देश की उर्जा जरूरतों को विकल्प देने के लिए देश भर में प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ़्त बिजली योजना लागू की गई है। इसके तहत उपभोक्ताओं को बेहद आसान प्रक्रिया के तहत सौर उर्जा उपकरण स्थापित कर वैकल्पिक उर्जा का माध्यम दिया जा रहा है। कोरिया जिला मुख्यालय बैकुण्ठपुर में रहने वाले वरिष्ठ नागरिक  अनिल शर्मा ने अपने घर की छत पर प्लांट लगाकर अपने मासिक बिजली बिल को लगभग शून्य कर लिया है। बढ़ती लागत के साथ अब तापीय विद्युत की आपूर्ति ना केवल उपभोक्ता के लिए मंहगी है वरन इस विद्युत का उत्पादन भी कहीं ना कहीं पर्यावरण की चिंता का मुख्य कारण बन रहा है। ऐसे में आज की आवश्यकता है कि हम बिजली के उन स्रोतों की ओर आगे बढ़े जो पर्यावरण के बिल्कुल अनुकूल हों। प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ़्त बिजली योजना सौर उर्जा एक ऐसा ही शानदार विकल्प बनकर उभर रहा है।  

सूर्यघर योजना के तहत लाभ लेने वाले महलपारा निवासी अनिल शर्मा ने बताया कि उन्होने जानकारी होने पर अपने घर में बिजली की खपत के अनुसार अपने नाम पर तीन किलोवाट का एक संयंत्र लगवाया और फिर बढ़ती जरूरतों के अनुसार उन्होने अपने बेटे के नाम पर भी एक तीन किलो का सोलर प्लांट रूफटाप पर लगवाया है। अब उनके पास हर समय बिजली का एक शानदार स्रोत है।

श्री शर्मा ने बताया कि प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ़्त बिजली योजना बेहद शानदार है। इसमें आने वाली लागत का लगभग सत्तर प्रतिशत राशि आसानी से अनुदान के तहत प्राप्त हो जाती है और बैंक से आसान ऋण लेकर इसे अपने घरों की छत पर लगवाया जा सकता है। उन्होने बताया कि प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ़्त बिजली योजना में केंद्र सरकार से 78 हजार और राज्य सरकार से 30 हजार की सब्सिडी वह प्राप्त कर चुके हैं।

 उन्होंने ने बताया कि उनके घर में कुछ किराएदार भी रहते हैं जिससे बिजली की निरंतर खपत होती रहती हैं। अत्यधिक खपत के कारण बढ़ी हुई दरों से बिजली का मूल्यांकन होता था जिससे पहले बिजली बिल बहुत अधिक आता था लेकिन अब जबसे सोलर रूपटॉप लगा है बिजली बिल लगभग शून्य हो चुका है। उन्होने इस अच्छे और सस्ते उर्जा स्रोत के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को धन्यवाद देते हुए कहा यह योजना बहुत ही सराहनीय है उन्हे इसका लाभ अच्छे से मिल रहा है।

कोरिया में चर्चाओं के केंद्र में परलकोट वाले साहब, मोबाइल ढूंढने में बहाया था पानी, अब PDS की चौखट पर टिकीं नजरें!



बैकुंठपुर /छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक गलियारों में अपनी अनूठी कार्यशैली और 'जल निकासी' के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरने वाले चर्चित फूड इंस्पेक्टर राजेश विश्वास एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। कांकेर के पखांजूर स्थित परलकोट जलाशय में अपने महंगे आईफोन को तलाशने के लिए लाखों लीटर पानी बहाकर रातों-रात स्टार बने यह साहब अब कोरिया जिले में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

खास बात यह है कि कोरिया जैसे  जिले में इस समय महज दो फूड इंस्पेक्टरों के कंधों पर पूरे जिले की राशन व्यवस्था का दारोमदार है। एक ओर जहां जिले की उचित मूल्य की दुकानों से गरीबों का राशन गायब होने, वितरण में भारी गड़बड़ी और कालाबाजारी की शिकायतें आम जनता की चीख बनकर गूंज रही हैं, वहीं दूसरी ओर इन 'हाई-प्रोफाइल' साहब की मौजूदगी ने आम नागरिकों की नींद उड़ा दी है।

आईफोन के लिए बहा दिया था 41 लाख लीटर पानी

मई 2023 का वह वाकया किसे याद नहीं होगा, जब कांकेर के परलकोट जलाशय में सेल्फी लेते वक्त साहब का मोबाइल पानी में जा गिरा था। उसे बाहर निकालने के लिए नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए डीजल पंपों के जरिए 41 लाख लीटर पानी बर्बाद कर दिया गया था। उस दौरान प्रशासन और जल संसाधन विभाग को पानी की बर्बादी पर लीपापोती करने में पसीने छूट गए थे। अब जबकि साहब कोरिया जिले में डेरा डाले हुए हैं, तो स्थानीय स्तर पर यह सवाल लाजिमी है कि क्या उनकी प्रशासनिक तत्परता उतनी ही तेज है जितनी उस वक्त आईफोन को खोजने में दिखाई दी थी?

कोरिया में खाद्य आपूर्ति व्यवस्था की चुनौतियाँ प्रशासनिक कसावट के बीच राशन वितरण में सुधार की दरकार

कोरिया जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुचारू रूप से संचालित करना और राशन वितरण व्यवस्था में पारदर्शिता लाना हमेशा से एक बड़ा प्रशासनिक  दायित्व रहा है। वर्तमान में जिले में सीमित विभागीय अमले के भरोसे पूरी आपूर्ति व्यवस्था चल रही है। एक ओर जहाँ राशन दुकानों में अनियमितताओं और वितरण प्रक्रिया को दुरुस्त करने की माँगे उठ रही हैं, वहीं दूसरी ओर हाल की समीक्षा  बैठक में मिली हिदायतों के बाद विभागीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली और प्राथमिकताओं पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।

जानकारी के मुताबिक जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। गरीबों के हिस्से का चावल समय पर न पहुंचना,और संचालकों की मनमानी यहां की आम समस्या बन चुकी है।ऐसे में क्या आईफोन वाले साहब ने कभी इतनी ही तत्परता और दिन-रात एक करने की जिद कोरिया जिले की राशन दुकानों की जांच में दिखाई है? गरीबों के निवाले पर डाका डालने वालों पर वैसी ही सख्ती बरती जाएगी जैसे उस समय पंप ऑपरेटरों पर दबाव बनाकर पानी खाली कराने में दिखाई गई थी।

कागजों में टेंडर, मैदान में पोल: कोरिया वन मंडल में CA प्लांटेशन के नाम पर नियमों की धज्जियां उड़ाता प्रशासनिक सिंडिकेट! • RTI में छिपाए आंकड़े, मजदूरों के पसीने का मोल दबाया... अब बिना कार्यादेश सामग्री खपाने की मची होड़


बैकुंठपुर
/कोरिया वन मंडल के कंपेंसेट्री एफॉरेस्टेशन प्लांटेशन मद से स्वीकृत करोड़ों रुपये के वनीकरण कार्यों में नियमों को ताक पर रखने का खेल अब अपनी सीमाओं को लांघता नजर आ रहा है। चाहे प्लांटेशन में बिना सूचना पट्ट के मजदूरों की दिहाड़ी दर छुपाने का मामला हो, या परसा कोल माइंस की फाइलों पर DFO और रेंजर कार्यालय द्वारा सूचना के अधिकार (RTI) के तहत दो अलग-अलग राग अलापने की बात हो|'बोल बच्चन न्यूज' ने हर धांधली की परतें प्रमुखता से खोलने प्रयास किया हैं। अब इसी शृंखला में CA प्लांटेशन की सुरक्षा घेराबंदी को लेकर एक और बड़ा वित्तीय व प्रक्रियात्मक झोल सामने आया है।

टेंडर अभी खुला नहीं, फिर कार्यस्थल पर फेंसिंग पोल

विश्वस्त सूत्रों और मैदानी पड़ताल से मिली जानकारी के अनुसार, कोरिया वन मंडल अंतर्गत CA प्लांटेशन क्षेत्रों की सुरक्षा फेंसिंग के लिए प्रयुक्त होने वाले आरसीसी  पोल की खरीद हेतु शासकीय 'जेम' (GeM) पोर्टल पर अभी टेंडर प्रक्रियाधीन ही है।  नियमों के मुताबिक जब तक टेंडर प्रक्रिया पूरी होकर संबंधित फर्म को कार्यादेश जारी न हो जाए, तब तक कार्यस्थल पर किसी भी सामग्री का पहुंचना पूरी तरह गैर-कानूनी और नियम-विरुद्ध है। लेकिन धरातल की हकीकत यह है कि टेंडर खुलने से पहले ही CA प्लांटेशन स्थलों पर फेंसिंग पोल पहुंचने की कि चर्चा हैं।

विभागीय गलियारों में तैरती खबरों की मानें तो कोरिया वमंडल के किसी पूर्ववर्ती निर्माण अथवा वनीकरण कार्य के लिए  क्रय किए गए फेंसिंग पोल का उपयोग होना शेष रह गया था। विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने कथित तौर पर मौखिक आदेशों पर उन पुराने पोलों को उठाकर  CA प्लांटेशन स्थल पर शिफ्ट करवाने की बात सामने आ रही है।इस दशा में बड़ा सवाल उठता है कि,स्थानांतरित कराए गए ये आरसीसी पोल मूलतःकिस योजना, किस बीट और किस कक्ष क्रमांक के लिए खरीदे गए थे? स्वीकृत  स्थल पर इनका उपयोग क्यों नहीं हुआ और इन्हें वहां से हटाने संबंधी भौतिक सत्यापन  की विभागीय रिपोर्ट कहाँ है? वहीं  जब CA प्लांटेशन का पृथक से भारी-भरकम बजट स्वीकृत है, जिसमें झाड़ी कटाई से लेकर घेराबंदी तक हर काम की राशि तय है, तो फिर दूसरे मद के सामान को यहाँ खपाने की हड़बड़ी क्यों मचाई जा रही है?

DFO के पूर्व पदस्थापना के दौरान'खास' सप्लायरों का गठजोड़?

सूत्रों का दावा तो यह भी है कि वर्तमान में पदस्थ वनमंडलाधिकारी के पूर्व पदस्थापना क्षेत्र के पसंदीदा सप्लायरों के इशारे पर ही यह सामग्री नियम-विरुद्ध तरीके से कार्यस्थल पर भिजवाई गई है। हालांकि, इस दावे की अंतिम प्रामाणिकता विभागीय जांच और दस्तावेजी साक्ष्यों से ही तय होगी, लेकिन यदि आगामी टेंडर का आवंटन इत्तेफाक से उसी क्षेत्र या चहेते सप्लायर को हो जाता है, तो इस पूरे पर्दे के पीछे चल रहे सिंडिकेट का भंडाफोड़ खुद-ब-खुद हो जाएगा।

गौरतलब है कि,एक तरफ CA प्लांटेशन में 20और25 रुपये प्रति गड्ढा या 300 रुपये दिहाड़ी का भ्रम फैलाकर मजदूरों के पसीने का मोल छुपाया जा रहा है, दूसरी तरफ अब टेंडर से पहले सामग्री की नियम विरुद्ध सप्लाई ने साबित कर दिया है कि कोरिया वन मंडल में नियमों और वित्तीय पारदर्शिता की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। देखना यह होगा कि इस फॉलो-अप रिपोर्ट के बाद उच्चाधिकारी गहरी नींद से जागते हैं या फिर कागजी लिपा-पोती कर करोड़ों के इस खेल को रफा-दफा कर दिया जाता है।

एक विभाग, दो अधिकारी और RTI पर दो अलग राग,कोरिया वन मंडल में सूचना छिपाने का उलझा खेल!


• DFO कार्यालय ने अभिलेखों के अवलोकन हेतु भेजा चालान का बुलावा, तो रेंजर ने  जानकारी स्पष्ट नहीं बताकर फेरा पानी

• एक ही कानून और एक ही विषय पर अफसरों के विरोधाभासी जवाबों से उजागर हुई विभागीय साठगांठ

• जब सूचना के अधिकार पर ही नहीं मिल पा रहे सुर-ताल, तब इनके भरोसे कैसे सुरक्षित रहेगा करोड़ों का वनीकरण?


बैकुंठपुर/
सूचना का अधिकार अधिनियम हर शासकीय विभाग के लिए एक समान लागू होता है, लेकिन कोरिया वन मंडल में अधिकारियों के अपने-अपने अलग नियम-कायदे चलते दिख रहे हैं। एक ही विषय और एक ही प्रकरण से संबंधित जानकारी मांगने पर वन मंडल के मुखिया यानी डीएफओ और उनके अधीनस्थ रेंजर  के जवाबों में  ज़मीन-आसमान का अंतर देखने को मिल रहा है ।

DFO कार्यालय का बुलावा,दस्तावेज मांगे तो थमा दिया अवलोकन और चालान का फरमान

परसा ओपन कास्ट कोल माइंस के संबंध में  स्वीकृत DPR, ग्राम सभा के प्रस्तावों की प्रति और संशोधित आदेशों की प्रमाणित प्रतियां RTI के तहत कोरिया वनमंडल  से मांगी गई थीं। लेकिन DFO कार्यालय ने नियमों को दरकिनार करते हुए आवेदक को दस्तावेज देने की बजाय  मानचित्रकार शाखा में आकर अभिलेखों के अवलोकन और  चालान भरने का फरमान जारी कर दिया। DFO कार्यालय के पत्र पर आवेदक ने लिखित पत्र प्रस्तुत कर स्पष्ट किया, कि मूल आवेदन में अवलोकन की मांग ही नहीं की गई थी, बल्कि स्पष्ट रूप से प्रमाणित प्रतियां मांगी गई थीं। RTI अधिनियम की धारा 7(9) के तहत आवेदक जिस स्वरूप में जानकारी चाहे, उसे उसी रूप में मुहैया कराना अनिवार्य है। चालान बनवाकर अवलोकन के लिए बुलाना साफ जाहिर करता है कि DFO दफ्तर में फाइलें मौजूद और स्पष्ट हैं, फिर भी प्रमाणित प्रतियां जारी न करके जानकारी को टालने और गोलमाल करने का प्रयास किया जा रहा।हैरानी की बात तब सामने आई जब उसी प्रकरण की जानकारी के लिए  वनपरिक्षेत्राधिकारी बैकुंठपुर कार्यालय से जारी पत्र  में यह बहाना बनाकर सीधे इंकार कर दिया कि मांगी गई जानकारी में विशिष्टियों का उल्लेख नहीं है एवं कार्य का नाम स्पष्ट न होने के कारण जानकारी उपलब्ध कराया जाना संभव नहीं है।अब प्रश्न यह उठता है कि जिस आवेदन और कार्य की जानकारी DFO कार्यालय के लिए बिल्कुल स्पष्ट थी और जिसके लिए आवेदक को फीस जमा करके मानचित्रकार शाखा में फाइलें देखने बुलाया गया, वही जानकारी रेंजर के लिए अचानक अस्पष्ट और असंभव कैसे हो गई? एक ही महकमे में सूचना के अधिकार आवेदन पर डीएफओ और रेजर का अलग-अलग राग आलापना समझ से परे है 

करोड़ों के CA प्लांटेशन का सच कैसे आएगा सामने?

जब सूचना के अधिकार जैसे संवेदनशील और पारदर्शी कानून को लेकर एक ही विभाग के अफसरों  के बीच कोई तालमेल नहीं है, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि भीतरखाने किस कदर अव्यवस्था होगी, जब RTI के सामान्य आवेदनों पर अधिकारी अपनी ही बात से मुकर रहे हैं और विरोधाभासी पत्र जारी कर रहे हैं, तब ऐसे बेताल प्रशासनिक अमले के भरोसे करोड़ों रुपये के CA प्लांटेशन पर पारदर्शी की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

25 रुपये गड्ढा या 300 रुपये दिहाड़ी? CA प्लांटेशन में मजदूरों के हिस्से का सच छिपाने में जुटा वन विभाग!

नदारद सूचना पट्ट और कागजी आंकड़ों के बीच पसीना बहाने को मजबूर ग्रामीण मजदूर



बैकुण्ठपुर/कोरिया वन मंडल के वनीकरण कार्यक्रमों में कागजी आंकड़ों और मैदानी वास्तविकताओं के बीच का फासला कम होने का नाम नहीं ले रहा है। CA प्लांटेशन पोड़ी-बचरा क्षेत्र के मुगूम में इन दिनों पौधे लगाने के लिए गड्ढा खुदवाने का काम चल रहा है, जहाँ पसीना बहाने वाले ग्रामीण मजदूरों के सामने मजदूरी की दरें अब भी एक पहेली बनी हुई हैं। वन विभाग की इस कार्यशैली ने एक बार फिर वनांचल के भीतर सुलगते प्रशासनिक सवालों को हवा दे दी है।

मजदूरों की जुबानी- 20 से बढ़कर 25 रुपये या फिक्स 300?

मुगूम क्षेत्र के इस प्लांटेशन  काम में जुटे पुरुष और महिला श्रमिकों से जब उनकी दिहाड़ी और मेहनत के मोल पर बात की गई, तो अजीबोगरीब विरोधाभास सामने आया। मजदूरों के मुताबिक 2×2 आकार के एक गड्ढे की खुदाई के एवज में उन्हें पहले 20 रुपये देने की बात कही गई थी, जिसे अब बढ़ाकर 25 रुपये प्रति गड्ढा किए जाने की चर्चा है। वहीं, कुछ अन्य श्रमिकों ने बताया कि उन्हें रोजाना के हिसाब से 300 रुपये मजदूरी देने कहा गया है। एक ही कार्यस्थल पर दरों को लेकर इस तरह के अलग-अलग दावे यह बताने के लिए काफी हैं कि वन विभाग का कामगारों के प्रति कितना लचर रवैया है।

सूचना पट्ट नदारद, भ्रम के बीच पसीना बहा रहे ग्रामीण

शासकीय नियमों की बात करे तो किसी भी वन विकास अथवा वनीकरण स्थल पर काम शुरू होने से पहले एक स्पष्ट सूचना पट्ट लगाया जाना अनिवार्य होता है। बोर्ड पर कार्य का नाम, कुल लागत, पौधों की संख्या और दैनिक मजदूरी दर का ब्योरा दर्ज होना चाहिए ताकि काम करने वाले हर मजदूर को उसका अधिकार पता हो। लेकिन बारी के बाद मुगूम के इस स्थान पर ऐसा कोई बोर्ड दूर-दूर तक नजर नहीं आता। बोर्ड न होने के कारण वहां काम करने वाले ग्रामीण अंधेरे में तीर चलाने को मजबूर हैं।

बारी के बाद मुगूम: वही ढर्रा, वही लापरवाही

कोरिया वन मंडल के भीतर CA प्लांटेशन कार्यों में अनियमितता का यह कोई पहला वाकया नहीं है। इससे पहले पोड़ी-बचरा के ही 'बारी' प्लांटेशन में गड्ढा खुदाई के दौरान बरती गई अनियमितता खूब सुर्खियों में रही थीं। उस दौरान घनी झाड़ियों के बीच गड्ढे खुदवाने और दो गड्ढों के बीच की निर्धारित न्यूनतम दूरी के मानकों और कम मजदूरी दर के मामले सामने आए थे। अब मुगूम में नाम मात्र की झाड़ी कटाई के बीच वही पुरानी पटकथा दोहराई जा रही है।

करोड़ों रुपये के इन प्लांटेशन प्रोजेक्ट्स में मजदूरी दरों के फेर और पन्ने पलटने में वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी आखिर क्यों पर्दा डाले बैठे हैं? मस्टररोल के वास्तविक आंकड़े छिपाने की यह कला किस मजबूरी के तहत उपजी है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल भुगतान की प्रक्रिया होना बाकी है, और सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि वन विभाग अंततः किस दर से मजदूरों को पारिश्रमिक का भुगतान करता है।

दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का निधन: अभिनय के एक बेबाक और संजीदा युग का अंत



न्यूज डेस्क/बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के गोवा स्थित आवास पर कार्डियक अरेस्ट (हार्ट अटैक) के कारण 75 वर्ष की उम्र में निधन की दुखद खबर सामने आई है।भारतीय सिनेमा में अपनी कड़क आवाज, अनूठी संवाद शैली और दमदार अभिनय से दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले महान अभिनेता नाना पाटेकर का निधन कला जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। 'परिंदा', 'क्रांतिवीर' और 'अग्नि साक्षी' जैसी फिल्मों से पहचान बनाने वाले नाना न केवल एक महान कलाकार थे, बल्कि अपनी सादगी और समाजसेवा के लिए भी जाने जाते थे।  

1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में जन्मे नाना पाटेकर (विश्वनाथ पाटेकर) का शुरुआती जीवन काफी तंगहाली में बीता। परिवार का हाथ बटाने के लिए उन्होंने सड़कों पर थियेटर के पोस्टर पेंट करने और जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में पढ़ाई के दौरान छोटे-मोटे काम करने तक का सफर तय किया। थियेटर के प्रति उनके इसी जुनून ने उन्हें अभिनय की गहराइयों से जोड़ा। 1978 में फिल्म 'गमन' से शुरुआत करने के बाद नाना को सही पहचान 1989 की फिल्म 'परिंदा' से मिली। इस फिल्म में 'अन्ना' के नकारात्मक चरित्र में उनके अभिनय ने उन्हें पहला राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता) दिलाया।

फिल्म'क्रांतिवीर' (1994) उनके करियर का सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित हुई, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इसके बाद 'तिरंगा', 'अग्नि साक्षी', 'खामोशी' और 'वजूद' जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा का सबसे भरोसेमंद और लोकप्रिय स्टार बना दिया। हिंदी सिनेमा में आए बदलावों के बीच उन्होंने खुद को नया रूप दिया और कॉमेडी की ओर रुख किया। फिल्म 'वेलकम' (2007) में उनके 'उदय भाई' के किरदार ने हर पीढ़ी के दर्शकों का दिल जीत लिया। इसके अलावा 'राजनीति' (2010) में उनके संजीदा अभिनय की भी काफी सराहना हुई।

नाना पाटेकर को उनके अभिनय के साथ-साथ उनकी सादगी और समाजसेवा के लिए हमेशा याद रखा जाएगा। उन्होंने 'नाम फाउंडेशन' (Naam Foundation) की स्थापना कर महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में किसानों और उनके परिवारों को बड़ी आर्थिक मदद पहुंचाई।भारतीय सिनेमा में उनके योगदान और उनके बेबाक अंदाज को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।

शिवपुर-चरचा में अध्यक्ष पद की जंग पर बढ़ी सियासी नजरें, बीजेपी से कुंती चक्रधारी का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में




बैकुंठपुर/कोरिया जिले की नगर पालिका शिवपुर-चरचा में आगामी नगरीय निकाय चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। अध्यक्ष पद सामान्य महिला वर्ग के लिए आरक्षित होने के बाद अब बीजेपी के भीतर संभावित दावेदारों को लेकर मंथन शुरू हो गया है। इसी बीच बीजेपी की संभावित दावेदारों में पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष कुंती चक्रधारी का नाम चर्चा में है। कुंती चक्रधारी नगर पालिका शिवपुर-चरचा की पूर्व अध्यक्ष रही हैं और स्थानीय निकाय की राजनीति में उनका अनुभव रहा है। यही वजह है कि अध्यक्ष पद के लिए संभावित महिला चेहरों की चर्चा में उनका नाम सामने आ रहा है। हालांकि बीजेपी ने अभी तक अध्यक्ष पद के लिए किसी प्रत्याशी के नाम की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। ऐसे में अंतिम फैसला पार्टी संगठन और नेतृत्व के स्तर पर होना बाकी है। 

शिवपुर-चरचा में अध्यक्ष पद का आरक्षण सामने आने के बाद राजनीतिक समीकरण भी तेजी से बदल रहे हैं। सामान्य महिला सीट होने के कारण अब महिला नेताओं की सक्रियता बढ़ गई है और संभावित दावेदार अपने-अपने स्तर पर राजनीतिक संपर्क और संगठनात्मक गतिविधियों में जुटे हुए हैं। बीजेपी के संभावित चेहरों की बात करें तो पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष कुंती चक्रधारी का नाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वह पहले इस पद की जिम्मेदारी संभाल चुकी हैं। नगर पालिका की कार्यप्रणाली, स्थानीय मुद्दों और क्षेत्र की राजनीतिक परिस्थितियों से उनका पुराना जुड़ाव रहा है। यही अनुभव उनकी दावेदारी की चर्चा का एक प्रमुख आधार है। दूसरी ओर पार्टी के सामने संगठन, स्थानीय समीकरण, वार्ड स्तर की स्थिति और जीतने योग्य उम्मीदवार के चयन जैसी कई चुनौतियां भी रहेंगी। फिलहाल बीजेपी की ओर से आधिकारिक तौर पर कोई नाम तय नहीं किया गया है, लेकिन संभावित दावेदारों की चर्चा में कुंती चक्रधारी का नाम लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। अब निगाहें बीजेपी नेतृत्व के फैसले पर हैं। पार्टी किस महिला चेहरे पर भरोसा जताती है और किसे शिवपुर-चरचा नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए मैदान में उतारती है, इसका इंतजार है। अध्यक्ष पद के लिए आरक्षण के बाद शुरू हुई यह राजनीतिक कवायद आने वाले दिनों में और तेज होने के संकेत दे रही है।

खौफ से बेखौफ तक का सफर: कभी वन मंडल में छुपने वाले रिटायर्ड सीपी पटेल, अब रात में भी कर रहे बेखौफ काम!



बैकुण्ठपुर/कोरिया वन मंडल में नियमों  का मखौल किस कदर उड़ाया जा रहा है, इसकी बानगी देखनी हो तो रात के वक्त वन मंडल कार्यालय के मानचित्रकार शाखा का चक्कर लगा लीजिए। करीब दो महीने पहले सेवानिवृत्त हो चुके पूर्व मानचित्रकार  सीपी पटेल आज भी दफ्तर में डटे हुए हैं। सवाल यह उठ रहा है कि अपने पूरे सेवाकाल के दौरान ऐसा कौन-सा अति-महत्वपूर्ण कार्य रह गया था, जिसे निपटाने के लिए अब उम्र के इस पड़ाव पर सीपी पटेल को छुट्टी के दिनों में भी रात आठ-आठ बजे तक हाड़-तोड़ मेहनत करनी पड़ रही है?

सूत्रों के मुताबिक सेवानिवृत्त होने के करीब दो माह बाद भी सीपी पटेल ने  अपना प्रभार  किसी  कर्मचारी को नहीं सौंपा है,इसकी पुष्टि हम नहीं करते है लेकिन यह दावा सच हुआ तो क्या कोरिया वन मंडल में छत्तीसगढ़ शासन के नियमों से इतर कोई नया विभागीय कानून लागू  है,जिससे कि किसी रिटायर्ड कर्मचारी को न तो कार्यभार से मुक्त किया जा रहा है और न ही दफ्तर की कुर्सियों से उनका मोह भंग हो रहा है?

DFO साहब! उम्र के इस पड़ाव पर तो तरस खाइए


 रिएटायर्ड मानचित्रकार की उम्र और  सेहत पर कम से कम इंसानियत के नाते ही सही,डीएफओ साहब को थोड़ा तरस खाना चाहिए। जिस उम्र में लोग पेंशन और आराम के हकदार होते हैं, उस उम्र में एक सेवानिवृत्त व्यक्ति से देर रात तक काम लिया जा रहा है। आख़िर ऐसी क्या  रहस्यमयी मजबूरी है, जिसके कारण डीएफओ साहब उन्हें दफ्तर के भीतर रात में भी कार्य करने की खुली छूट दे रखे है।

SECL चिरमिरी प्रकरण की पुरानी यादें: जब डर के मारे भाग खड़े होते थे पटेल


इस पूरे घटनाक्रम के बीच सीपी पटेल का एक पुराना कारनामा फिर से चर्चा में आ गया है। कुछ वर्ष पूर्व एसईसीएल क्षेत्र चिरमिरी क्षेत्र से जुड़े एक मामले में बुरी तरह घिर गए थे। सूत्र बताते हैं कि उस समय सीपी पटेल की रातों की नींद उड़ी हुई थी और आलम यह था कि एक  व्यक्ति की आहट मात्र से वह वन मंडल दफ्तर छोड़कर भाग खड़े होते थे।खैर,वक्त का पहिया घूमा उस मामले पर क्या लीपापोती हुई, इसकी जानकारी जुटाई जा रही है, लेकिन आज वही सीपी पटेल डीएफओ की छत्रछाया में देर रात तक वन मंडल कार्यालय में बेखौफ  जमे हैं।

दूरस्थ स्कूलों में पहुंचीं कलेक्टर, बच्चों से किया सीधा संवाद प्राचार्य को फटकार, छात्राओं को दी सीख.हर लड़की का आत्मनिर्भर होना जरूरी

 


’कोरिया/कलेक्टर श्रीमती रोक्तिमा यादव ने सोनहत विकासखंड के ग्राम उज्ञाव और बंशीपुर स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों का निरीक्षण कर विद्यार्थियों से सीधा संवाद किया। उन्होंने कक्षाओं में पहुंचकर बच्चों की शैक्षणिक समझ परखी और शिक्षण व्यवस्था की जानकारी ली।

कलेक्टर ने विद्यार्थियों से पढ़ाई के संबंध में सवाल किए। कक्षा 9वीं और 10वीं की छात्राओं से ब्लैकबोर्ड पर गणित के सवाल हल कराएं, वहीं प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों से पहाड़े और कविताएं सुनीं। बच्चों की शैक्षणिक समझ और उत्साह देखकर उन्होंने उनका उत्साहवर्धन किया।

’हर लड़की का आत्मनिर्भर होना जरूरी’

छात्राओं से संवाद करते हुए कलेक्टर ने कहा कि जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। सपने देखना, उनका पूरा होना और कभी बिखर जाना भी जीवन का हिस्सा है। सफलता और असफलता दोनों परिस्थितियों में अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रत्येक लड़की का आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से सक्षम होना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि यह मायने नहीं रखता कि कोई गांव से है या शहर से अथवा आर्थिक रूप से संपन्न परिवार से या कमजोर परिवार से। अभावों में पले.बढ़े अनेक लोगों ने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर देश.दुनिया में पहचान बनाई है। विद्यार्थियों को हमेशा सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए और मन में किसी तरह की हीन भावना नहीं रखनी चाहिए।

कलेक्टर ने बच्चों से कहा कि वे अपने शिक्षक.शिक्षिकाओं से खूब सवाल करें। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह प्रकृति में अलग.अलग तरह के पेड़, पौधे और फूल होते हैं, उसी तरह समाज में भी हर व्यक्ति की अपनी विशेषता और महत्व है।

उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि यदि आज नियमित रूप से 5 से 7 घंटे मेहनत करेंगे तो यही मेहनत भविष्य और करियर की मजबूत नींव बनेगी। उन्होंने यह भी कहा कि करियर बनाने के लिए केवल पढ़ाई ही एकमात्र रास्ता नहीं है। खेल, कला, संस्कृति, व्यवसाय सहित विभिन्न क्षेत्रों में रुचि और जुनून के साथ आगे बढ़कर भी जीवन को नई दिशा दी जा सकती है।

’प्राचार्य को फटकारए शिक्षण में गुणवत्ता लाने के निर्देश’

निरीक्षण के दौरान कलेक्टर ने विद्यालय के प्राचार्य मेही लाल को पढ़ाई में गुणवत्ता सुधारने के निर्देश दिए और लापरवाही पर फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम के साथ सामान्य ज्ञान, प्रतियोगी परीक्षाओं और विभिन्न क्षेत्रों की जानकारी भी दी जाए।

कलेक्टर ने प्राथमिक कक्षा के बच्चों द्वारा 17 और 23 के पहाड़े सुनाए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि बच्चों में सीखने और समझने की क्षमता हैए उसे निखारने की जिम्मेदारी शिक्षकों की है। उन्होंने शिक्षकों से कहा कि वे विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों को अपने बच्चों की तरह समझकर पूरे मन से पढ़ाएं और उनके भविष्य को संवारने में अपनी भूमिका निभाएं।

उन्होंने कहा कि खेल.खेल में गणित और अंग्रेजी जैसे विषयों को भी आसानी से समझाया जा सकता है। विद्यार्थियों को जिले, संभाग, प्रदेश और देश की प्रमुख संस्थाओं एवं व्यक्तित्वों के बारे में भी जानकारी दी जाए, ताकि उनमें सामान्य ज्ञान के साथ आत्मविश्वास और अभिव्यक्ति की क्षमता विकसित हो।

कलेक्टर के संवाद से प्रभावित विद्यार्थियों ने उनकी बातों को गंभीरता से सुना और बताए मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया।

कोरिया वन मंडल में 'सुपर DFO' बने रिटायर्ड मानचित्रकार, SECL फाइलों और वनीकरण के नक्शों पर गैर-कानूनी कब्जा!



• बिना किसी जवाबदेही के संवेदनशील एस्टीमेट  निपटारा का अंदेशा

• डीएफओ परदेशी के मौन से और गहराया रहस्य,अवैध रूप से काम लेने के पीछे की क्या है साठगांठ?


कोरिया वन मंडल में नियमों को ताक पर रखकर डीएफओ परदेशी के नाक के नीचे सेवानिवृत्त मानचित्रकार सीपी पटेल की अनधिकृत मौजूदगी का मामला अब और गहराता जा रहा है। कभी एसईसीएल चिरमिरी क्षेत्र के भू-अर्जन, वन भूमि डायवर्जन और सीमांकन से जुड़े पेचीदा प्रकरणों में जो रिटायर्ड मानचित्रकार कभी दबाव में दिखे थे, वही सीपी पटेल अब वन मंडल कार्यालय बैकुंठपुर में डीएफओ की सीधी निगरानी में काम निपटाते नजर आ रहे हैं।

विभागीय सूत्रों के अनुसार, शासकीय सेवा से महीने पहले सेवानिवृत्त हो चुके सीपी पटेल को आज भी दफ्तर की मानचित्रकार शाखा में विशेष तरजीह दी जा रही है। सीए प्लांटेशन  जीपीएस मैपिंग और एसईसीएल खदान क्षेत्र से जुड़े करोड़ों रुपये के प्राक्कलन और अति-संवेदनशील जमीनी फाइलों का निपटारा आज भी वही कर रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि जिस व्यक्ति की शासकीय जवाबदेही शून्य हो चुकी है, उसे संवेदनशील नक्शों और सरकारी अभिलेखों के साथ काम करने की छूट किसके आदेश  आखिर डीएफओ परदेशी ने किसके कहने या किस मजबूरी पर दी है?

डीएफओ परदेशी की लाचारी या मौन सहमति





इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाली बात कोरिया डीएफओ का रवैया है। सेवानिवृत्त कर्मचारी की दफ्तर में रोज की मौजूदगी और फाइलों पर उनके सीधे नियंत्रण को लेकर लगातार उठ रहे मुद्दों के बावजूद डीएफओ ने चुप्पी साध रखी है। वनांचल के जागरूक नागरिकों और वन महकमे के भीतर ही अब यह चर्चा आम हो गई है कि आखिर ऐसी  डीएफओ की क्या मजबूरी है जिसे  सार्वजनिक नहीं कर पा रहे हैं? क्या पूर्व में हुए एसईसीएल प्रकरणों और वर्तमान में वनीकरण के मामलों में हो रहे अनियमितता के राज छुपाने के लिए ही सीपी पटेल को बैकडोर से दफ्तर में बैठाया गया है।

बता दे कि,नियमों के मुताबिक, किसी भी गैर-अधिकृत या सेवानिवृत्त व्यक्ति द्वारा कार्यालय में शासकीय दस्तावेजों में फेरबदल या प्राक्कलन तैयार करना सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है। यदि कल को एसईसीएल चिरमिरी प्रकरण या सीए प्लांटेशन के नक्शों में कोई तकनीकी या वित्तीय गड़बड़ी उजागर होती है, तो इसकी जिम्मेदारी  डीएफओ परदेशी पर  तय होगी?

स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने मांग की है कि वन प्रधान मुख्य संरक्षक इस मामले पर तत्काल हस्तक्षेप करें। वन मंडल कार्यालय कोरिया की मानचित्रकार शाखा की के पिछले लगभग एक माह के रिकॉर्ड्स को जब्त कर सेवानिवृत्त मानचित्रकार सीपी पटेल की अनधिकृत दखलंदाजी पर अविलंब रोक  लगाई जाए।



भारतीय पनिका समाज की जिला स्तरीय मासिक समीक्षा बैठक सम्पन्न,सामाजिक नियमावली,सामाजिक जनगणना एवं सामाजिक भवन के विकास को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय!


कोरिया/भारतीय पनिका समाज,जिला कोरिया छत्तीसगढ़ की जिला स्तरीय मासिक समीक्षा बैठक दिनांक 04 अक्टूबर 2026 दिन रविवार को सम्पन्न हुई। बैठक में समाज के संगठनात्मक कार्यों की समीक्षा के साथ-साथ सामाजिक हित से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई तथा सर्वसम्मति से कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए।


समाज की सामाजिक नियमावली तैयार किए जाने के संबंध में निर्णय लिया गया कि जिले के प्रत्येक ग्राम इकाई समिति स्तर से लिखित प्रस्ताव 01 नवंबर 2026 के पूर्व जिला कार्यकारिणी द्वारा गठित 11 सदस्यीय दल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। प्राप्त प्रस्तावों के आधार पर सामाजिक नियमावली तैयार करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा।

सामाजिक जनगणना कराने का निर्णय

समाज के सदस्यों की वास्तविक एवं व्यवस्थित जानकारी संकलित करने के उद्देश्य से सामाजिक जनगणना कराने का निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया। इसके लिए आवश्यक प्रक्रिया एवं रूपरेखा आगामी चरण में निर्धारित की जाएगी।

सामाजिक भवन खोड़री के विकास की रणनीति

सामाजिक भवन खोड़री, बैकुंठपुर में आवश्यक बाउंड्री वॉल एवं अतिरिक्त कक्ष निर्माण कराए जाने को लेकर विस्तृत रणनीति तैयार करने का निर्णय लिया गया। भवन के विकास एवं समाज के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने हेतु आवश्यक प्रयास किए जाएंगे।

बैठक में राजाराम जांता,जिलाध्यक्ष,रामलाल टांडिया,जिला कोषाध्यक्ष,चंद्रिका प्रसाद,जिला उपाध्यक्ष,दीपक कुमार,ब्लॉक अध्यक्ष बैकुंठपुर,बबीता ग्वाले,जिलाध्यक्ष महिला समिति,हीराकली,उपाध्यक्ष महिला समिति,उमेश कुमार,सचिव युवा समिति,संजू पड़वार,उपाध्यक्ष युवा समिति,भरत देवांगन,उपाध्यक्ष युवा समिति सहित श्रवण कुमार,राकेश कोराम,बिजेंद्र पड़वार,गंगाराम,रामलखन,सुभाष पड़वार,राजकुमार देवांगन,जयप्रकाश,राममिलन तांजे, शोमदास,विजय कोराम,अरविन्द कुमार (ब्लॉक सचिव,पटना),बबली देवांगन (सदस्य) एवं भारती (मीडिया प्रभारी,महिला समिति) उपस्थित रहे।


कभी सड़कों पर बिखेरती थी अपनी चमक, आज कोरिया में विश्राम फरमा रही है 'सवारी-ए-खास' एम्बेसेडर


​बैकुंठपुर (कोरिया, छत्तीसगढ़)

​वक्त भले ही बदल जाए और आधुनिक गाड़ियों का दौर आ जाए, लेकिन कुछ तस्वीरें ऐसी होती हैं जो सीधा अतीत के उस सुनहरे दौर में ले जाती हैं जहाँ सादगी, मजबूती और रुतबे की अपनी अलग ही पहचान हुआ करती थी। कोरिया जिले में विश्राम फरमा रही सफेद रंग की हिंदुस्तान एम्बेस्डर आज भी उस दौर की गरिमा और शानदार यादों को अपने आप में समेटे हुए है।

​अतीत का वह रसूखदार दौर

एक जमाना था जब भारतीय सड़कों पर एम्बेसेडर का राज हुआ करता था। यह सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीति और सामाजिक गौरव का प्रतीक थी। कलेक्टर, एसपी, मंत्री और उच्चाधिकारियों की पसंदीदा सवारी रही इस गाड़ी की छत पर लगी बत्ती और इसकी कतारबद्ध आवाजाही सत्ता और सम्मान की पहचान मानी जाती थी। जब यह कार अपनी खास गड़गड़ाहट और धमक के साथ सड़कों से गुजरती थी, तो हर किसी की निगाहें इसकी ओर टिक जाती थीं।

​प्रकृति के सानिध्य में बीते दिनों की यादें

कोरिया जिले की हरियाली और पेड़ों की छांव के बीच खड़ी यह एम्बेसेडर कार आज प्रकृति के आगोश में एक शांत पहरेदार की तरह नजर आती है। कार पर लिपटी हरी-भरी लताएं और पत्तियां ऐसा अहसास कराती हैं मानो समय ने इसे एक यादगार स्मारक का रूप दे दिया हो। इसके पिछले हिस्से पर लगा भारत स्टेज-II का मार्क और पुराना रजिस्ट्रेशन नंबर आज भी उन बीते पन्नों को जिंदा करता है जब कोरिया के विकास और प्रशासनिक निर्णयों की गवाह यही एम्बेसेडर हुआ करती थी।

​एक अनमोल ऐतिहासिक धरोहर

1950 के दशक से लेकर दशकों तक देश की सड़कों पर एकछत्र राज करने वाली एम्बेसेडर को यूं ही 'किंग ऑफ इंडियन रोड्स' नहीं कहा जाता था। इसका विशाल सोफे जैसा कम्फर्ट, मजबूत बॉडी और रॉयल लुक हर भारतीय के दिल में खास जगह रखता था। आज कोरिया में मौजूद यह गाड़ी भले ही शांत खड़ी हो, लेकिन इसके दर्शन मात्र से ही उस दौर की गरिमा, सादगी और वीआईपी संस्कृति के दिन आंखों के सामने जीवंत हो उठते हैं।

​यह गाड़ी मात्र एक धातु का ढांचा नहीं, बल्कि कोरिया जिले के प्रशासनिक इतिहास और हमारे अतीत की एक बेहद खूबसूरत और अनमोल यादगार है।

'पोड़ी बचरा' CA प्लांटेशन के करोड़ों के बजट पर अफसरों की नजर'!

परसा ओपन कास्ट कोल माइंस के एवज में मिले भारी-भरकम फंड को 'खपाने' की होड़; डीएफओ की वापसी या एसडीओ का'गृह प्रेम'?




बैकुंठपुर/कोरिया:परसा ओपन कास्ट कोल माइंस के एवज में कोरिया वन मंडल के बैकुंठपुर वन परिक्षेत्र अंतर्गत 'पोड़ी बचरा में स्वीकृत हुआ क्षतिपूरक वनीकरण (CA Plantation) का करोड़ों का प्रोजेक्ट अब हरियाली लाने के बजाय अफसरों की 'अवैध कमाई' का जरिया बनता नजर आ रहा है। बोल बच्चन न्यूज के लगातार खुलासों के बाद अब विभागीय गलियारों में इस बात की चर्चा आम है कि आखिर क्यों इस वन मंडल में कुछ खास अधिकारियों और कर्मचारियों का जमावड़ा अचानक बढ़ गया है।

करोड़ों का प्रोजेक्ट और 'जुगाड़' से वापसी की पटकथा

सूत्रों के मुताबिक, कोरिया वनमंडल के डीएफओ की इस वन मंडल में दोबारा पदस्थापना होना महज एक इत्तेफाक नहीं है। बताया जा रहा है कि डीएफओ को पहले से ही भली-भांति जानकारी थी कि परसा माइंस के एवज में 'इंटीग्रेटेड CA प्लांटेशन' का करोड़ों रुपये का बजट कोरिया वन मंडल में ही खर्च किया जाना है। इसी भारी-भरकम राशि को 'साधने' के लिए कथित तौर पर रसूख और जुगाड़ के दम पर दोबारा कोरिया में पोस्टिंग कराई गई।अगर इन दावों पर तनिक भी सच्चाई है तो  निश्चित ही शासन के स्थानांतरण नीति के सामने जुगाड़ की यह नीति ज्यादा कारगर साबित हो रहा है।






'गृह वन मंडल' का मोह या CA प्लांटेशन पर नजर?

इस पूरे खेल में सबसे अहम और चर्चित किरदार के रूप में एसडीओ के.एस. कंवर का नाम उभरकर सामने आ रहा है। कभी इसी कोरिया वन मंडल में रेंजर के पद पर तैनात रहे कंवर साहब, पदोन्नति के बाद अन्य जिलों में अपनी सेवाएं दे रहे थे। लेकिन जैसे ही 'पोड़ी बचरा' के करोड़ों के CA फंड की मंजूरी की भनक लगी, वे भी अपने 'गृह वन मंडल' बैकुंठपुर लौटने से खुद को रोक नहीं पाए।चर्चा तो यहां तक है कि कंवर साहब ने एड़ी-चोटी का जोर लगाकर बैकुंठपुर में एसडीओ के रूप में अपनी वापसी पक्की की। इतना ही नहीं, जिस मुगूम बारी पैच में यह काम चल रहा है, वहां खुद को 'स्थानीय' बताकर मजदूरों के विरोध और धरातलीय बदहाली को दबाने  का जिम्मा भी इन्होंने ही संभाल रखा है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर एक प्रशासनिक अधिकारी का यह 'अति-उत्साह' जंगलों को बचाने के लिए है या फिर करोड़ों के बजट में अपनी हिस्सेदारी तय करने के लिए?

 रिटायर कर्मचारी और चहेते भी मैदान में

सेवानिवृत्ति के बावजूद कार्यालय की कुर्सियों पर जमे मानचित्रकार और विभाग के 'स्वघोषित शुभचिंतक'की जुगलबंदी ने पूरे मामले को संदिग्ध बना दिया है।करोड़ों के प्रोजेक्ट का कार्य बिना किसी आगामी तैयारी  के बेमौशम शुरूवात करा देना कई सवाल खड़े करता है, प्लांटेशन के नाम पर सिर्फ गढ्ढे की खुदाई कर भारी भरकम राशि आहरण होने के अंदेशों से इंकार नहीं किया जा सकता। जरूरत है कि प्रोजेक्ट अनुसार वृक्षारोपण का कार्य कैसे हो सके।लेकिन जिस प्रकार से करोड़ों के इस वृक्षारोपण प्रोजेक्ट को हरियाली  के नाम पर विभागीय अधिकारी पलीता लगाने प्रयास कर रहे है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि हरियाली के नाम पर सिर्फ और सिर्फ प्रोजेक्ट से जुड़े लोग ही असल हरियाली का मजा ले सकेंगे।

गौरतलब है कि उक्त CA प्लांटेशन में मजदूरों से ₹20 प्रति गड्ढे की मामूली दर पर कार्य कराने  की बात सामने आई थी।बाद में मजदूरों के विरोध और काम रोकने के बाद बढ़ता विवाद देख विभागीय अधिकारी लोक लुभावन देकर फिर से काम शुरू कराये।बता दे कि गड्ढा खुदाई कार्य जिस पैच में कराया जा रहा है वहां बिना किसी तैयारी के ही डीएफओ कोरिया के निगरानी में कार्य कराया जा रहा है।कोरिया वनमण्डल के डीएफओ  और उनके मातहत अधिकारियों और कर्मचारियों के द्वारा नियम-विरुद्ध तरीके से बारिश के दिनों से ही आनन-फानन में गढ्ढे की खुदाई कराकर केवल औपचारिकताओं की पूर्ति की जा रही है। इससे साफ जाहिर है कि अफसरों की इस तिकड़ी और उनके सिंडिकेट को लगने वाले पौधो को जिंदा रखने से कोई सरोकार नहीं है, इनका एकमात्र मकसद है कि,सिर्फ कागजों पर पौधरोपण दर्शाकर करोड़ों के सरकारी खजाने को किस प्रकार  से अपनी जेबों में भर सकें।बड़ा सवाल यह है किक्या शासन-प्रशासन और वन विभाग के उच्च अधिकारी इस 'जुगाड़ू सिंडिकेट' की मंशा और पोड़ी बचरा CA प्लांटेशन में पनप रहे इस बड़े घोटाले पर संज्ञान लेंगे, या फिर  मनमाफिक हो रहे  कार्यों पर गांधारी की तरह आँखो  पर  पट्टी बांध कर तमाशा देखेंगे।