कोरिया वन मंडल में अफसरशाही का तानाशाही रवैया: DFO परदेशी के आने के बाद संवाद हीनता चरम पर, नाक के नीचे चल रहा फर्जी मस्टररोल का खेल!


• आगंतुकों से परहेज और फोन उठाने से तौहीन? अड़ियल रवैये के बीच वनांचल में फल-फूल रहा भ्रष्टाचार का सिंडिकेट!
• सोनहत और देवगढ़ परिक्षेत्र में रिश्तेदारों के नाम पर फर्जी हाजिरी: सरकारी खजाने से लंबे समय से हो रहा अवैध आहरण
• ई-कुबेर के बाद अब फर्जी मस्टररोल बना काली कमाई का जरिया, क्या करोड़ों के CA प्लांटेशन में भी दोहराया जाएगा वही पुराना ढर्रा?



बैकुंठपुर/कोरिया वन मंडल में दोबारा पदस्थ  वनमंडलाधिकारी  चंद्रशेखर शंकर सिंह परदेशी के आने के बाद से वन महकमे के भीतर प्रशासनिक कार्यशैली और पारदर्शिता की धज्जियां उड़ती साफ नजर आ रही हैं। एक तरफ जहां कार्यालय में अपनी अड़ियल छवि और आगंतुकों से दूरी बनाने के रवैये को लेकर DFO साहब लगातार चर्चाओं में हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके ठीक नाक के नीचे मैदानी अमला और विभागीय कर्मचारी बेखौफ होकर फर्जीवाड़े की इबारत लिख रहे हैं। अगर अफसरशाही का यह 'एटीट्यूड' विभाग के वास्तविक मैदानी कार्यों के निरीक्षण में दिखा होता, तो शायद वनांचल क्षेत्रों में चल रहा फर्जी मस्टररोल का यह संगठित खेल कब का बेनकाब हो चुका होता।

सोनहत और देवगढ़ में रिश्तेदारों के नाम फर्जी हाजिरी का बड़ा खेल

चौंकाने वाला मामला वनांचल क्षेत्र सोनहत और देवगढ़ वन परिक्षेत्र से जुड़ा सामने आ रहा है। सूत्र बताते हैं कि यहां पदस्थ मैदानी अधिकारी और कर्मचारी अपने सगे-संबंधियों, नाते-रिश्तेदारों और कागजी नामों के सहारे लंबे समय से फर्जी मस्टररोल तैयार कर शासकीय राशि का धड़ल्ले से आहरण कर रहे हैं। जिस जगह मजदूर पसीना बहाते तक नहीं, वहां कागजों पर फर्जी हाजिरी लगाकर सरकारी खजाने को चूना लगाया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि सालों से जारी इस फर्जीवाड़े की भनक क्या आला अधिकारियों को नहीं थी, या फिर जानबूझकर आंखें मूंदकर इस सिंडिकेट को फलने-फूलने का अभयदान दिया जाता रहा?

संवादहीनता और तानाशाही: फोन का जवाब न देना बना दिनचर्या

विभाग के उच्च पद पर बैठे अधिकारी का जनता, जनप्रतिनिधियों और मीडिया के प्रति रवैया कितना लचर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दफ्तर में आगंतुकों से मिलना तो दूर, फोन पर उठने वाले सवालों का जवाब देना भी उनकी प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि यदि इस एटीट्यूड का आधा हिस्सा भी वनीकरण, प्लांटेशन और बजट आहरण की मैदानी जांच में लगाया गया होता, तो विभाग को शर्मसार करने वाले इन फर्जी मस्टररोल गिरोहों की जगह सलाखों के पीछे होती।

ई-कुबेर के बाद फर्जी मस्टररोल बना अवैध कमाई का नया जरिया!

विभागीय गतिविधियों की पड़ताल करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि वन विभाग में ई-कुबेर प्रणाली के कड़े नियंत्रण के बाद अब निचले से लेकर ऊपरी स्तर तक अवैध कमाई का सबसे महफूज और आसान जरिया 'फर्जी मस्टररोल' को बना लिया गया है। फर्जी मजदूरों के नाम पर स्वीकृत कराई गई राशि किसके-किसके खातों में जा रही है और इसका कितना कमीशन किस-किस कुर्सी तक पहुंच रहा है यह निष्पक्ष जांच का बड़ा विषय है।

क्या CA प्लांटेशन में भी चलेगा  पुराने अंदाज वाला फर्जीवाड़ा?

वर्तमान में पोड़ी बचरा,  क्षेत्रों में CA प्लांटेशन का काम चल रहा है, जहां पहले से ही सूचना पट्ट नदारद रहने और 25 रुपये प्रति गड्ढा या 300 रुपये दिहाड़ी को लेकर मजदूरों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। सोनहत और देवगढ़ के इस खुले भंडाफोड़ के बाद अब सबसे बड़ा संशय यह खड़ा हो गया है कि क्या करोड़ों के इस CA प्लांटेशन प्रोजेक्ट को भी फर्जी मस्टररोल के उसी पुराने ढर्रे पर निपटाया जाएगा? या फिर इस बार कागजी मजदूरों की जगह धरातल पर काम करने वाले वास्तविक  मजदूरों को उनका हक मिलेगा?अब देखना यह होगा कि  जिम्मेदार महकमा गहरी नींद से जागकर सोनहत और देवगढ़ के फर्जी मस्टररोल सिंडिकेट पर जांच बैठाता है, या फिर DFO साहब की खामोशी इस पूरे खेल को संरक्षण देती रहेगी।

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