डीएफओ की वापसी, एसडीओ का 'होम ग्राउंड' में लौटना, सेवानिवृत्त मानचित्रकार का 'कुर्सी मोह' और 'कथित एक शुभचिंतक' क्या परसा कोल माइंस का फंड ही है इस 'धमाल' की असली वजह?
'धमाल' के स्टारकास्ट जैसा प्रशासनिक सिंडिकेट: बंद कमरों से 'W' (खजाने) तक बिछी बिसात
बैकुण्ठपुर/कोरिया वन मण्डल का यह प्रशासनिक ड्रामा 'धमाल' फिल्म के उस सीन जैसा लगता है, जहाँ हर किरदार की नजरें सिर्फ और सिर्फ उस '10 करोड़ के खजाने' पर टिकी होती हैं। परसा कोल माइंस से मिले करोड़ों रुपये के बजट की फाइलें खुलते ही वनमंलड में DFO की वापसी होती है और पोड़ी बचरा CA का शांत पड़ा वनीकरण प्रोजेक्ट अचानक स्पीड पकड़ लेता है। ठीक इसी मोड़ पर बैकुंठपुर के स्थानीय निवासी और वानण्डल के पूर्व रेंजर साहब अब SDO की पावरफुल भूमिका में सामने आते हैं। लोकल भूगोल का कोना-कोना जानने के कारण इस भारी-भरकम प्रोजेक्ट से जुड़ जाते है। वहीं दफ्तर के कोने में शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके मानचित्रकार का अंदाज़ "हम अंग्रेजों के ज़माने के मानचित्रकार हैं!" की तर्ज पर बिना किसी आधिकारिक जवाबदेही के कुर्सी से चिपके दिखते हैं। वहीं एक 'कथित क्षेत्रीय शुभचिंतक' ठेकेदारी के समीकरण सेट कर रहा है। इस पूरी स्टारकास्ट के बीच रेंजर साहब फूले नहीं समा रहे—क्योंकि जब ऊपर से 'ग्रीन सिग्नल' हो, तो जमीनी बदहाली की फिक्र किसे होती है!
'धमाल' की तर्ज पर सिस्टम को ठेंगा दिखाकर काम शुरू
फिल्म 'धमाल' में जैसे बिना किसी प्लानिंग के सीधे ज़मीन खोदना शुरू कर दिया जाता था, मुगम बारी में भी कुछ इसी अंदाज वही रीटेक दोहराया जा रहा है। वन विभाग के नियम (SOP) कहते हैं कि पहले ज़मीन की सफाई (साइट क्लीयरेंस), समतलीकरण, फेंसिंग और पानी का इंतज़ाम होना चाहिए, उसके बाद गड्ढे खुदने चाहिए। लेकिन यहाँ का ड्रामा बिल्कुल उल्टा फिल्माया जा रहा है—न ज़मीन साफ हुई, न सुरक्षा घेरा बना और न सिंचाई की एक बूंद दिखी... सीधे मजदूरों को उतारकर गड्ढा खुदाई शुरू करा दी गई। शुरुवाती व्यवस्था का नामोनिशान नहीं है, पर कुदालें बज रही हैं। यह कोई वनीकरण की गंभीरता नहीं, बल्कि सिर्फ मस्टर रोल भरकर बजट पचाने का 'कागजी स्टंट' नजर आ रहा है।
मजदूरों का दर्द: ₹20 की प्रस्तावित दर और ठप होता काम
फिल्म में जैसे 'मानव' और 'आदित्य' से हाड़-तोड़ काम करवाकर अंत में निराशा हाथ लगती थी, वैसा ही सीन मुगूम बारी के मैदान में घट रहा है। हालांकि मजदूरों को अभी भुगतान नहीं हुआ है, लेकिन उनका स्पष्ट कहना है कि अधिकारियों ने प्रति गड्ढा महज ₹20 देने की बात कही है। मुरम और अत्यधिक पत्थरीली जमीन पर दोपहर की धूप में 2×2 फीट का गड्ढा खोदकर मजदूर दिनभर में मुश्किल से 10 गड्ढे भी तैयार नहीं कर पाता है, यानी दिनभर की कुल दिहाड़ी का अंदाजा आप लगा सकते है मेहनत के अनुपात में इस ₹20 के रेट को मजदूरों ने सरासर अन्याय और शोषण करार दिया है।
नियमों के साथ खिलवाड़
यह पूरा घटनाक्रम किसी ऐसी फिल्म की शूटिंग जैसा है जो गलत मौसम में की जा रही हो। वनीकरण के वैज्ञानिक नियम और मौसम का मिजाज साफ कहते हैं कि गड्ढा खुदाई का सही वक्त अक्टूबर के बाद (ठंड में) होता है, ताकि धूप और हवा से मिट्टी का प्राकृतिक उपचार हो सके। लेकिन वन विभाग भारी बारिश के बीचों-बीच गड्ढे खुदवाने की ज़िद पर अड़ा है। गड्ढे पानी से भरकर कीचड़ में तब्दील हो रहे हैं। वैज्ञानिक तरीका और नियम ताक पर हैं, मानो अफसरों को पौधों को ज़िंदा रखने से कोई मतलब नहीं, बस समय-सीमा के भीतर बजट के आंकड़ों की एंट्री पूरी करनी है।
बिना तैयारी के 'रोल-कैमरा-एक्शन'
ग्राउंड जीरो का दृश्य देखकर लगता है कि वन विभाग ने बिना किसी तैयारी के सीधे 'एक्शन' बोल दिया है। जिस ज़मीन पर नया पौधा रोपा जाना है, वहां घुटनों तक उगी जंगली घास और कंटीली झाड़ियों का राज है। नियम के मुताबिक पहले पूरे इलाके की सफाई होनी चाहिए थी, लेकिन झाड़ियों के बीच ही जैसे-तैसे कुदाल चलाकर औपचारिकता पूरी की जा रही है। अगर इस घने जंगल के बीच नया पौधा लगा भी दिया जाए, तो जंगली खरपतवार उसका दम घोंट देगी। यह दृश्य साबित करता है कि धरातल पर तैयारी के नाम पर सिर्फ शून्य है।
बिना फेंसिंग के 'ओपन गार्डन'
मैदान का अगला सीन किसी कॉमेडी ड्रामा जैसा है। करोड़ों रुपये का बजट होने के बाद भी पूरे प्लांटेशन क्षेत्र में सुरक्षा फेंसिंग (तार घेरा) का कोई वजूद नहीं है। आवारा मवेशी बेखौफ होकर खुदे हुए गड्ढों के बीच टहल रहे हैं। बिना फेंसिंग के पौधरोपण का यह काम वैसा ही है जैसे बिना चौकीदार के खुली सड़क पर खजाना छोड़ देना! मवेशियों की बेरोक-टोक आवाजाही यह साबित करती है कि अफसरों का ध्यान लगने वाले पौधों को बचाने पर बिल्कुल नहीं, बल्कि केवल ठेकेदारी और बजट ठिकाने लगाने पर केंद्रित है।
क्या 'W' का खजाना बचेगा या फाइल दफन होगी?
इस पूरी खोजी रिपोर्ट का क्लाइमैक्स एक बड़े सवाल पर आकर रुकता है। परसा कोल माइंस के एवज में मिला करोड़ों रुपये का यह फंड क्या इसी तरह बिना फेंसिंग, बिना पानी, बिना सफाई और मजदूरों के असंतोष की बलि चढ़कर 'प्रशासनिक सिंडिकेट' की जेब में चला जाएगा? क्या विभाग के आला अधिकारी इस 'धमाल' शैली के कागजी दावों और धरातलीय बदहाली की निष्पक्ष जांच कराएंगे, या फिर हर बार की तरह इस बार भी करोड़ों का वनीकरण सिर्फ फाइलों में हरा-भरा दिखाकर दफन कर दिया जाएगा?











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