कोरिया में चर्चाओं के केंद्र में परलकोट वाले साहब, मोबाइल ढूंढने में बहाया था पानी, अब PDS की चौखट पर टिकीं नजरें!



बैकुंठपुर /छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक गलियारों में अपनी अनूठी कार्यशैली और 'जल निकासी' के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरने वाले चर्चित फूड इंस्पेक्टर राजेश विश्वास एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। कांकेर के पखांजूर स्थित परलकोट जलाशय में अपने महंगे आईफोन को तलाशने के लिए लाखों लीटर पानी बहाकर रातों-रात स्टार बने यह साहब अब कोरिया जिले में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

खास बात यह है कि कोरिया जैसे  जिले में इस समय महज दो फूड इंस्पेक्टरों के कंधों पर पूरे जिले की राशन व्यवस्था का दारोमदार है। एक ओर जहां जिले की उचित मूल्य की दुकानों से गरीबों का राशन गायब होने, वितरण में भारी गड़बड़ी और कालाबाजारी की शिकायतें आम जनता की चीख बनकर गूंज रही हैं, वहीं दूसरी ओर इन 'हाई-प्रोफाइल' साहब की मौजूदगी ने आम नागरिकों की नींद उड़ा दी है।

आईफोन के लिए बहा दिया था 41 लाख लीटर पानी

मई 2023 का वह वाकया किसे याद नहीं होगा, जब कांकेर के परलकोट जलाशय में सेल्फी लेते वक्त साहब का मोबाइल पानी में जा गिरा था। उसे बाहर निकालने के लिए नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए डीजल पंपों के जरिए 41 लाख लीटर पानी बर्बाद कर दिया गया था। उस दौरान प्रशासन और जल संसाधन विभाग को पानी की बर्बादी पर लीपापोती करने में पसीने छूट गए थे। अब जबकि साहब कोरिया जिले में डेरा डाले हुए हैं, तो स्थानीय स्तर पर यह सवाल लाजिमी है कि क्या उनकी प्रशासनिक तत्परता उतनी ही तेज है जितनी उस वक्त आईफोन को खोजने में दिखाई दी थी?

कोरिया में खाद्य आपूर्ति व्यवस्था की चुनौतियाँ प्रशासनिक कसावट के बीच राशन वितरण में सुधार की दरकार

कोरिया जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुचारू रूप से संचालित करना और राशन वितरण व्यवस्था में पारदर्शिता लाना हमेशा से एक बड़ा प्रशासनिक  दायित्व रहा है। वर्तमान में जिले में सीमित विभागीय अमले के भरोसे पूरी आपूर्ति व्यवस्था चल रही है। एक ओर जहाँ राशन दुकानों में अनियमितताओं और वितरण प्रक्रिया को दुरुस्त करने की माँगे उठ रही हैं, वहीं दूसरी ओर हाल की समीक्षा  बैठक में मिली हिदायतों के बाद विभागीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली और प्राथमिकताओं पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।

जानकारी के मुताबिक जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। गरीबों के हिस्से का चावल समय पर न पहुंचना,और संचालकों की मनमानी यहां की आम समस्या बन चुकी है।ऐसे में क्या आईफोन वाले साहब ने कभी इतनी ही तत्परता और दिन-रात एक करने की जिद कोरिया जिले की राशन दुकानों की जांच में दिखाई है? गरीबों के निवाले पर डाका डालने वालों पर वैसी ही सख्ती बरती जाएगी जैसे उस समय पंप ऑपरेटरों पर दबाव बनाकर पानी खाली कराने में दिखाई गई थी।

कागजों में टेंडर, मैदान में पोल: कोरिया वन मंडल में CA प्लांटेशन के नाम पर नियमों की धज्जियां उड़ाता प्रशासनिक सिंडिकेट! • RTI में छिपाए आंकड़े, मजदूरों के पसीने का मोल दबाया... अब बिना कार्यादेश सामग्री खपाने की मची होड़


बैकुंठपुर
/कोरिया वन मंडल के कंपेंसेट्री एफॉरेस्टेशन प्लांटेशन मद से स्वीकृत करोड़ों रुपये के वनीकरण कार्यों में नियमों को ताक पर रखने का खेल अब अपनी सीमाओं को लांघता नजर आ रहा है। चाहे प्लांटेशन में बिना सूचना पट्ट के मजदूरों की दिहाड़ी दर छुपाने का मामला हो, या परसा कोल माइंस की फाइलों पर DFO और रेंजर कार्यालय द्वारा सूचना के अधिकार (RTI) के तहत दो अलग-अलग राग अलापने की बात हो|'बोल बच्चन न्यूज' ने हर धांधली की परतें प्रमुखता से खोलने प्रयास किया हैं। अब इसी शृंखला में CA प्लांटेशन की सुरक्षा घेराबंदी को लेकर एक और बड़ा वित्तीय व प्रक्रियात्मक झोल सामने आया है।

टेंडर अभी खुला नहीं, फिर कार्यस्थल पर फेंसिंग पोल

विश्वस्त सूत्रों और मैदानी पड़ताल से मिली जानकारी के अनुसार, कोरिया वन मंडल अंतर्गत CA प्लांटेशन क्षेत्रों की सुरक्षा फेंसिंग के लिए प्रयुक्त होने वाले आरसीसी  पोल की खरीद हेतु शासकीय 'जेम' (GeM) पोर्टल पर अभी टेंडर प्रक्रियाधीन ही है।  नियमों के मुताबिक जब तक टेंडर प्रक्रिया पूरी होकर संबंधित फर्म को कार्यादेश जारी न हो जाए, तब तक कार्यस्थल पर किसी भी सामग्री का पहुंचना पूरी तरह गैर-कानूनी और नियम-विरुद्ध है। लेकिन धरातल की हकीकत यह है कि टेंडर खुलने से पहले ही CA प्लांटेशन स्थलों पर फेंसिंग पोल पहुंचने की कि चर्चा हैं।

विभागीय गलियारों में तैरती खबरों की मानें तो कोरिया वमंडल के किसी पूर्ववर्ती निर्माण अथवा वनीकरण कार्य के लिए  क्रय किए गए फेंसिंग पोल का उपयोग होना शेष रह गया था। विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने कथित तौर पर मौखिक आदेशों पर उन पुराने पोलों को उठाकर  CA प्लांटेशन स्थल पर शिफ्ट करवाने की बात सामने आ रही है।इस दशा में बड़ा सवाल उठता है कि,स्थानांतरित कराए गए ये आरसीसी पोल मूलतःकिस योजना, किस बीट और किस कक्ष क्रमांक के लिए खरीदे गए थे? स्वीकृत  स्थल पर इनका उपयोग क्यों नहीं हुआ और इन्हें वहां से हटाने संबंधी भौतिक सत्यापन  की विभागीय रिपोर्ट कहाँ है? वहीं  जब CA प्लांटेशन का पृथक से भारी-भरकम बजट स्वीकृत है, जिसमें झाड़ी कटाई से लेकर घेराबंदी तक हर काम की राशि तय है, तो फिर दूसरे मद के सामान को यहाँ खपाने की हड़बड़ी क्यों मचाई जा रही है?

DFO के पूर्व पदस्थापना के दौरान'खास' सप्लायरों का गठजोड़?

सूत्रों का दावा तो यह भी है कि वर्तमान में पदस्थ वनमंडलाधिकारी के पूर्व पदस्थापना क्षेत्र के पसंदीदा सप्लायरों के इशारे पर ही यह सामग्री नियम-विरुद्ध तरीके से कार्यस्थल पर भिजवाई गई है। हालांकि, इस दावे की अंतिम प्रामाणिकता विभागीय जांच और दस्तावेजी साक्ष्यों से ही तय होगी, लेकिन यदि आगामी टेंडर का आवंटन इत्तेफाक से उसी क्षेत्र या चहेते सप्लायर को हो जाता है, तो इस पूरे पर्दे के पीछे चल रहे सिंडिकेट का भंडाफोड़ खुद-ब-खुद हो जाएगा।

गौरतलब है कि,एक तरफ CA प्लांटेशन में 20और25 रुपये प्रति गड्ढा या 300 रुपये दिहाड़ी का भ्रम फैलाकर मजदूरों के पसीने का मोल छुपाया जा रहा है, दूसरी तरफ अब टेंडर से पहले सामग्री की नियम विरुद्ध सप्लाई ने साबित कर दिया है कि कोरिया वन मंडल में नियमों और वित्तीय पारदर्शिता की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। देखना यह होगा कि इस फॉलो-अप रिपोर्ट के बाद उच्चाधिकारी गहरी नींद से जागते हैं या फिर कागजी लिपा-पोती कर करोड़ों के इस खेल को रफा-दफा कर दिया जाता है।

एक विभाग, दो अधिकारी और RTI पर दो अलग राग,कोरिया वन मंडल में सूचना छिपाने का उलझा खेल!


• DFO कार्यालय ने अभिलेखों के अवलोकन हेतु भेजा चालान का बुलावा, तो रेंजर ने  जानकारी स्पष्ट नहीं बताकर फेरा पानी

• एक ही कानून और एक ही विषय पर अफसरों के विरोधाभासी जवाबों से उजागर हुई विभागीय साठगांठ

• जब सूचना के अधिकार पर ही नहीं मिल पा रहे सुर-ताल, तब इनके भरोसे कैसे सुरक्षित रहेगा करोड़ों का वनीकरण?


बैकुंठपुर/
सूचना का अधिकार अधिनियम हर शासकीय विभाग के लिए एक समान लागू होता है, लेकिन कोरिया वन मंडल में अधिकारियों के अपने-अपने अलग नियम-कायदे चलते दिख रहे हैं। एक ही विषय और एक ही प्रकरण से संबंधित जानकारी मांगने पर वन मंडल के मुखिया यानी डीएफओ और उनके अधीनस्थ रेंजर  के जवाबों में  ज़मीन-आसमान का अंतर देखने को मिल रहा है ।

DFO कार्यालय का बुलावा,दस्तावेज मांगे तो थमा दिया अवलोकन और चालान का फरमान

परसा ओपन कास्ट कोल माइंस के संबंध में  स्वीकृत DPR, ग्राम सभा के प्रस्तावों की प्रति और संशोधित आदेशों की प्रमाणित प्रतियां RTI के तहत कोरिया वनमंडल  से मांगी गई थीं। लेकिन DFO कार्यालय ने नियमों को दरकिनार करते हुए आवेदक को दस्तावेज देने की बजाय  मानचित्रकार शाखा में आकर अभिलेखों के अवलोकन और  चालान भरने का फरमान जारी कर दिया। DFO कार्यालय के पत्र पर आवेदक ने लिखित पत्र प्रस्तुत कर स्पष्ट किया, कि मूल आवेदन में अवलोकन की मांग ही नहीं की गई थी, बल्कि स्पष्ट रूप से प्रमाणित प्रतियां मांगी गई थीं। RTI अधिनियम की धारा 7(9) के तहत आवेदक जिस स्वरूप में जानकारी चाहे, उसे उसी रूप में मुहैया कराना अनिवार्य है। चालान बनवाकर अवलोकन के लिए बुलाना साफ जाहिर करता है कि DFO दफ्तर में फाइलें मौजूद और स्पष्ट हैं, फिर भी प्रमाणित प्रतियां जारी न करके जानकारी को टालने और गोलमाल करने का प्रयास किया जा रहा।हैरानी की बात तब सामने आई जब उसी प्रकरण की जानकारी के लिए  वनपरिक्षेत्राधिकारी बैकुंठपुर कार्यालय से जारी पत्र  में यह बहाना बनाकर सीधे इंकार कर दिया कि मांगी गई जानकारी में विशिष्टियों का उल्लेख नहीं है एवं कार्य का नाम स्पष्ट न होने के कारण जानकारी उपलब्ध कराया जाना संभव नहीं है।अब प्रश्न यह उठता है कि जिस आवेदन और कार्य की जानकारी DFO कार्यालय के लिए बिल्कुल स्पष्ट थी और जिसके लिए आवेदक को फीस जमा करके मानचित्रकार शाखा में फाइलें देखने बुलाया गया, वही जानकारी रेंजर के लिए अचानक अस्पष्ट और असंभव कैसे हो गई? एक ही महकमे में सूचना के अधिकार आवेदन पर डीएफओ और रेजर का अलग-अलग राग आलापना समझ से परे है 

करोड़ों के CA प्लांटेशन का सच कैसे आएगा सामने?

जब सूचना के अधिकार जैसे संवेदनशील और पारदर्शी कानून को लेकर एक ही विभाग के अफसरों  के बीच कोई तालमेल नहीं है, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि भीतरखाने किस कदर अव्यवस्था होगी, जब RTI के सामान्य आवेदनों पर अधिकारी अपनी ही बात से मुकर रहे हैं और विरोधाभासी पत्र जारी कर रहे हैं, तब ऐसे बेताल प्रशासनिक अमले के भरोसे करोड़ों रुपये के CA प्लांटेशन पर पारदर्शी की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

25 रुपये गड्ढा या 300 रुपये दिहाड़ी? CA प्लांटेशन में मजदूरों के हिस्से का सच छिपाने में जुटा वन विभाग!

नदारद सूचना पट्ट और कागजी आंकड़ों के बीच पसीना बहाने को मजबूर ग्रामीण मजदूर



बैकुण्ठपुर/कोरिया वन मंडल के वनीकरण कार्यक्रमों में कागजी आंकड़ों और मैदानी वास्तविकताओं के बीच का फासला कम होने का नाम नहीं ले रहा है। CA प्लांटेशन पोड़ी-बचरा क्षेत्र के मुगूम में इन दिनों पौधे लगाने के लिए गड्ढा खुदवाने का काम चल रहा है, जहाँ पसीना बहाने वाले ग्रामीण मजदूरों के सामने मजदूरी की दरें अब भी एक पहेली बनी हुई हैं। वन विभाग की इस कार्यशैली ने एक बार फिर वनांचल के भीतर सुलगते प्रशासनिक सवालों को हवा दे दी है।

मजदूरों की जुबानी- 20 से बढ़कर 25 रुपये या फिक्स 300?

मुगूम क्षेत्र के इस प्लांटेशन  काम में जुटे पुरुष और महिला श्रमिकों से जब उनकी दिहाड़ी और मेहनत के मोल पर बात की गई, तो अजीबोगरीब विरोधाभास सामने आया। मजदूरों के मुताबिक 2×2 आकार के एक गड्ढे की खुदाई के एवज में उन्हें पहले 20 रुपये देने की बात कही गई थी, जिसे अब बढ़ाकर 25 रुपये प्रति गड्ढा किए जाने की चर्चा है। वहीं, कुछ अन्य श्रमिकों ने बताया कि उन्हें रोजाना के हिसाब से 300 रुपये मजदूरी देने कहा गया है। एक ही कार्यस्थल पर दरों को लेकर इस तरह के अलग-अलग दावे यह बताने के लिए काफी हैं कि वन विभाग का कामगारों के प्रति कितना लचर रवैया है।

सूचना पट्ट नदारद, भ्रम के बीच पसीना बहा रहे ग्रामीण

शासकीय नियमों की बात करे तो किसी भी वन विकास अथवा वनीकरण स्थल पर काम शुरू होने से पहले एक स्पष्ट सूचना पट्ट लगाया जाना अनिवार्य होता है। बोर्ड पर कार्य का नाम, कुल लागत, पौधों की संख्या और दैनिक मजदूरी दर का ब्योरा दर्ज होना चाहिए ताकि काम करने वाले हर मजदूर को उसका अधिकार पता हो। लेकिन बारी के बाद मुगूम के इस स्थान पर ऐसा कोई बोर्ड दूर-दूर तक नजर नहीं आता। बोर्ड न होने के कारण वहां काम करने वाले ग्रामीण अंधेरे में तीर चलाने को मजबूर हैं।

बारी के बाद मुगूम: वही ढर्रा, वही लापरवाही

कोरिया वन मंडल के भीतर CA प्लांटेशन कार्यों में अनियमितता का यह कोई पहला वाकया नहीं है। इससे पहले पोड़ी-बचरा के ही 'बारी' प्लांटेशन में गड्ढा खुदाई के दौरान बरती गई अनियमितता खूब सुर्खियों में रही थीं। उस दौरान घनी झाड़ियों के बीच गड्ढे खुदवाने और दो गड्ढों के बीच की निर्धारित न्यूनतम दूरी के मानकों और कम मजदूरी दर के मामले सामने आए थे। अब मुगूम में नाम मात्र की झाड़ी कटाई के बीच वही पुरानी पटकथा दोहराई जा रही है।

करोड़ों रुपये के इन प्लांटेशन प्रोजेक्ट्स में मजदूरी दरों के फेर और पन्ने पलटने में वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी आखिर क्यों पर्दा डाले बैठे हैं? मस्टररोल के वास्तविक आंकड़े छिपाने की यह कला किस मजबूरी के तहत उपजी है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल भुगतान की प्रक्रिया होना बाकी है, और सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि वन विभाग अंततः किस दर से मजदूरों को पारिश्रमिक का भुगतान करता है।

दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का निधन: अभिनय के एक बेबाक और संजीदा युग का अंत



न्यूज डेस्क/बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के गोवा स्थित आवास पर कार्डियक अरेस्ट (हार्ट अटैक) के कारण 75 वर्ष की उम्र में निधन की दुखद खबर सामने आई है।भारतीय सिनेमा में अपनी कड़क आवाज, अनूठी संवाद शैली और दमदार अभिनय से दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले महान अभिनेता नाना पाटेकर का निधन कला जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। 'परिंदा', 'क्रांतिवीर' और 'अग्नि साक्षी' जैसी फिल्मों से पहचान बनाने वाले नाना न केवल एक महान कलाकार थे, बल्कि अपनी सादगी और समाजसेवा के लिए भी जाने जाते थे।  

1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में जन्मे नाना पाटेकर (विश्वनाथ पाटेकर) का शुरुआती जीवन काफी तंगहाली में बीता। परिवार का हाथ बटाने के लिए उन्होंने सड़कों पर थियेटर के पोस्टर पेंट करने और जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में पढ़ाई के दौरान छोटे-मोटे काम करने तक का सफर तय किया। थियेटर के प्रति उनके इसी जुनून ने उन्हें अभिनय की गहराइयों से जोड़ा। 1978 में फिल्म 'गमन' से शुरुआत करने के बाद नाना को सही पहचान 1989 की फिल्म 'परिंदा' से मिली। इस फिल्म में 'अन्ना' के नकारात्मक चरित्र में उनके अभिनय ने उन्हें पहला राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता) दिलाया।

फिल्म'क्रांतिवीर' (1994) उनके करियर का सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित हुई, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इसके बाद 'तिरंगा', 'अग्नि साक्षी', 'खामोशी' और 'वजूद' जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा का सबसे भरोसेमंद और लोकप्रिय स्टार बना दिया। हिंदी सिनेमा में आए बदलावों के बीच उन्होंने खुद को नया रूप दिया और कॉमेडी की ओर रुख किया। फिल्म 'वेलकम' (2007) में उनके 'उदय भाई' के किरदार ने हर पीढ़ी के दर्शकों का दिल जीत लिया। इसके अलावा 'राजनीति' (2010) में उनके संजीदा अभिनय की भी काफी सराहना हुई।

नाना पाटेकर को उनके अभिनय के साथ-साथ उनकी सादगी और समाजसेवा के लिए हमेशा याद रखा जाएगा। उन्होंने 'नाम फाउंडेशन' (Naam Foundation) की स्थापना कर महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में किसानों और उनके परिवारों को बड़ी आर्थिक मदद पहुंचाई।भारतीय सिनेमा में उनके योगदान और उनके बेबाक अंदाज को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।

शिवपुर-चरचा में अध्यक्ष पद की जंग पर बढ़ी सियासी नजरें, बीजेपी से कुंती चक्रधारी का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में




बैकुंठपुर/कोरिया जिले की नगर पालिका शिवपुर-चरचा में आगामी नगरीय निकाय चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। अध्यक्ष पद सामान्य महिला वर्ग के लिए आरक्षित होने के बाद अब बीजेपी के भीतर संभावित दावेदारों को लेकर मंथन शुरू हो गया है। इसी बीच बीजेपी की संभावित दावेदारों में पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष कुंती चक्रधारी का नाम चर्चा में है। कुंती चक्रधारी नगर पालिका शिवपुर-चरचा की पूर्व अध्यक्ष रही हैं और स्थानीय निकाय की राजनीति में उनका अनुभव रहा है। यही वजह है कि अध्यक्ष पद के लिए संभावित महिला चेहरों की चर्चा में उनका नाम सामने आ रहा है। हालांकि बीजेपी ने अभी तक अध्यक्ष पद के लिए किसी प्रत्याशी के नाम की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। ऐसे में अंतिम फैसला पार्टी संगठन और नेतृत्व के स्तर पर होना बाकी है। 

शिवपुर-चरचा में अध्यक्ष पद का आरक्षण सामने आने के बाद राजनीतिक समीकरण भी तेजी से बदल रहे हैं। सामान्य महिला सीट होने के कारण अब महिला नेताओं की सक्रियता बढ़ गई है और संभावित दावेदार अपने-अपने स्तर पर राजनीतिक संपर्क और संगठनात्मक गतिविधियों में जुटे हुए हैं। बीजेपी के संभावित चेहरों की बात करें तो पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष कुंती चक्रधारी का नाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वह पहले इस पद की जिम्मेदारी संभाल चुकी हैं। नगर पालिका की कार्यप्रणाली, स्थानीय मुद्दों और क्षेत्र की राजनीतिक परिस्थितियों से उनका पुराना जुड़ाव रहा है। यही अनुभव उनकी दावेदारी की चर्चा का एक प्रमुख आधार है। दूसरी ओर पार्टी के सामने संगठन, स्थानीय समीकरण, वार्ड स्तर की स्थिति और जीतने योग्य उम्मीदवार के चयन जैसी कई चुनौतियां भी रहेंगी। फिलहाल बीजेपी की ओर से आधिकारिक तौर पर कोई नाम तय नहीं किया गया है, लेकिन संभावित दावेदारों की चर्चा में कुंती चक्रधारी का नाम लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। अब निगाहें बीजेपी नेतृत्व के फैसले पर हैं। पार्टी किस महिला चेहरे पर भरोसा जताती है और किसे शिवपुर-चरचा नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए मैदान में उतारती है, इसका इंतजार है। अध्यक्ष पद के लिए आरक्षण के बाद शुरू हुई यह राजनीतिक कवायद आने वाले दिनों में और तेज होने के संकेत दे रही है।

खौफ से बेखौफ तक का सफर: कभी वन मंडल में छुपने वाले रिटायर्ड सीपी पटेल, अब रात में भी कर रहे बेखौफ काम!



बैकुण्ठपुर/कोरिया वन मंडल में नियमों  का मखौल किस कदर उड़ाया जा रहा है, इसकी बानगी देखनी हो तो रात के वक्त वन मंडल कार्यालय के मानचित्रकार शाखा का चक्कर लगा लीजिए। करीब दो महीने पहले सेवानिवृत्त हो चुके पूर्व मानचित्रकार  सीपी पटेल आज भी दफ्तर में डटे हुए हैं। सवाल यह उठ रहा है कि अपने पूरे सेवाकाल के दौरान ऐसा कौन-सा अति-महत्वपूर्ण कार्य रह गया था, जिसे निपटाने के लिए अब उम्र के इस पड़ाव पर सीपी पटेल को छुट्टी के दिनों में भी रात आठ-आठ बजे तक हाड़-तोड़ मेहनत करनी पड़ रही है?

सूत्रों के मुताबिक सेवानिवृत्त होने के करीब दो माह बाद भी सीपी पटेल ने  अपना प्रभार  किसी  कर्मचारी को नहीं सौंपा है,इसकी पुष्टि हम नहीं करते है लेकिन यह दावा सच हुआ तो क्या कोरिया वन मंडल में छत्तीसगढ़ शासन के नियमों से इतर कोई नया विभागीय कानून लागू  है,जिससे कि किसी रिटायर्ड कर्मचारी को न तो कार्यभार से मुक्त किया जा रहा है और न ही दफ्तर की कुर्सियों से उनका मोह भंग हो रहा है?

DFO साहब! उम्र के इस पड़ाव पर तो तरस खाइए


 रिएटायर्ड मानचित्रकार की उम्र और  सेहत पर कम से कम इंसानियत के नाते ही सही,डीएफओ साहब को थोड़ा तरस खाना चाहिए। जिस उम्र में लोग पेंशन और आराम के हकदार होते हैं, उस उम्र में एक सेवानिवृत्त व्यक्ति से देर रात तक काम लिया जा रहा है। आख़िर ऐसी क्या  रहस्यमयी मजबूरी है, जिसके कारण डीएफओ साहब उन्हें दफ्तर के भीतर रात में भी कार्य करने की खुली छूट दे रखे है।

SECL चिरमिरी प्रकरण की पुरानी यादें: जब डर के मारे भाग खड़े होते थे पटेल


इस पूरे घटनाक्रम के बीच सीपी पटेल का एक पुराना कारनामा फिर से चर्चा में आ गया है। कुछ वर्ष पूर्व एसईसीएल क्षेत्र चिरमिरी क्षेत्र से जुड़े एक मामले में बुरी तरह घिर गए थे। सूत्र बताते हैं कि उस समय सीपी पटेल की रातों की नींद उड़ी हुई थी और आलम यह था कि एक  व्यक्ति की आहट मात्र से वह वन मंडल दफ्तर छोड़कर भाग खड़े होते थे।खैर,वक्त का पहिया घूमा उस मामले पर क्या लीपापोती हुई, इसकी जानकारी जुटाई जा रही है, लेकिन आज वही सीपी पटेल डीएफओ की छत्रछाया में देर रात तक वन मंडल कार्यालय में बेखौफ  जमे हैं।