कोरिया वन मंडल में 'महाघोटाले' की बू! वर्षों से डटे सी.पी. पटेल की संपत्ति की हो जांच; क्या सेवानिवृत्ति के बाद करोड़ों के 'प्लांटेशन प्रोजेक्ट' पर टिकी इनकी नजर ?


छुट्टी के दिन भी दफ्तर खोलकर फाइलों में हेराफेरी का अंदेशा; DFO की चुप्पी से भ्रष्टाचार के संरक्षण को मिल रहा बढ़ावा!

बैकुंठपुर। कोरिया वन मंडल में नियमों और प्रशासनिक मर्यादाओं का जिस बेशर्मी से मखौल उड़ाया जा रहा है, उसने अब एक साधारण प्रशासनिक लापरवाही से बढ़कर एक बड़े 'वित्तीय घोटाले' और भ्रष्टाचार की ओर इशारा करना शुरू कर दिया है। पूरे सेवाकाल के दौरान एक ही जगह जमे रहकर वन मंडल की जड़ों को खोखला करने वाले सेवानिवृत्त मानचित्रकार सी.पी. पटेल का रिटायरमेंट के महीने भर बाद भी दफ्तर पर कब्जा खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। आम कार्य दिवस तो छोड़िए, शनिवार जैसे शासकीय अवकाश के दिन भी यह सेवामुक्त 'आम इंसान' दफ्तर में बैठकर सरकारी नक्शों और फाइलों को खंगालता पाया जा रहा है।
अब इस पूरे अनधिकृत खेल के पीछे का असली खेल सामने आने लगा है। सूत्रों और स्थानीय जानकार लोगों का दावा है कि सी.पी. पटेल का यह 'पुनर्वसन' केवल किसी सेवा-भाव का नतीजा नहीं है, बल्कि इसके पीछे वन मंडल में आने वाले करोड़ों रुपये के CA प्लांटेशन प्रोजेक्ट (वृक्षारोपण परियोजनाओं) के भारी-भरकम बजट पर नजर टिके होना माना जा रहा है।

करोड़ों के प्रोजेक्ट्स और नक्शों का 'मास्टरमाइंड': संपत्ति की उच्च स्तरीय जांच की मांग

कोरिया वन मंडल में वन CA प्लांटेशन पोड़ी बचरा में करोड़ों रुपये के कार्य स्वीकृत हैं। इन परियोजनाओं का वास्तविक सीमांकन, नक्शा पास कराना और कागजी खानापूर्ति करना मानचित्रकार के हाथ में होता है। आशंका जताई जा रही है कि धरातल पर होने वाले फर्जीवाड़े और कागजी पौधों को सही ठहराने के लिए ही सी.पी. पटेल को रिटायरमेंट के बाद भी अनधिकृत रूप से कुर्सी पर बिठाकर रखा गया है।

अकूत संपत्ति की विजिलेंस/ACB से हो जांच:

एक ही जगह पर दशकों तक बने रहने और अब रिटायरमेंट के बाद भी दफ्तर न छोड़ने की इस जिद ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जागरूक नागरिकों और जन प्रतिनिधियों का कहना है कि सी.पी. पटेल के सेवाकाल के दौरान अर्जित की गई  संपत्ति की एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) और आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) से निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए।

शासकीय अवकाश के दिन दफ्तर में एंट्री: साक्ष्य मिटाने की साजिश?

शनिवार को जब दफ्तर पूरी तरह बंद रहता है और कोई जिम्मेदार अधिकारी मौजूद नहीं होता, तब एक बाहरी व्यक्ति का अकेले बैठकर फाइलें खंगालना इस बात का सीधा संकेत है कि या तो पुराने घोटालों के सबूतों को नष्ट किया जा रहा है या फिर आने वाले करोड़ों के प्रोजेक्ट्स की फाइलें तैयार की जा रही हैं।

DFO की संदिग्ध खामोशी: बाइट देने से कतराते रहे शीर्ष अफसर

इस पूरे गंभीर वित्तीय व प्रशासनिक भ्रष्टाचार के मामले में जब कोरिया वनमंडलाधिकारी (DFO) चंद्रशेखर शंकर सिंह परदेशी से उनका पक्ष (बाइट) जानने के लिए दूरभाष पर बार-बार संपर्क साधा गया, तो उन्होंने हमेशा की तरह फोन का कोई जवाब नहीं दिया।

मामले का दायरा बड़ा होते देख जब वृत्त स्तर के सबसे बड़े अधिकारी यानी मुख्य वन संरक्षक (CCF) से आधिकारिक बयान लेने का प्रयास किया गया, तो वे भी इस पूरे घालमेल पर कुछ भी कहने से बचते दिखे।

शीर्ष अधिकारियों का यूं अपना मुंह बंद कर लेना और कोई दंडात्मक कार्रवाई न करना यह साबित करता है कि करोड़ों के इस खेल में तार नीचे से लेकर ऊपर तक जुड़े हो सकते हैं। अगर समय रहते छत्तीसगढ़ का वन मंत्रालय और उच्च स्तरीय जांच एजेंसियां इस पर कड़ा संज्ञान नहीं लेती हैं, तो कोरिया वन मंडल में सरकारी जमीनों और प्रोजेक्ट्स के नाम पर भारी चूना लगना तय है।

पोड़ी बचरा CA प्लांटेशन बना कोरिया वन मण्डल का 'सेंट जेवियर गार्डन': करोड़ों के 'बजट'पर टिकीं नजरें, औपचारिकता में सिमटता दिख रहा वनीकरण!


डीएफओ  की वापसी, एसडीओ का 'होम ग्राउंड' में लौटना, सेवानिवृत्त मानचित्रकार का 'कुर्सी मोह' और 'कथित एक शुभचिंतक' क्या परसा कोल माइंस का फंड ही है इस 'धमाल' की असली वजह?
​'धमाल' के स्टारकास्ट जैसा प्रशासनिक सिंडिकेट: बंद कमरों से 'W' (खजाने) तक बिछी बिसात



​बैकुण्ठपुर/कोरिया वन मण्डल का यह प्रशासनिक ड्रामा 'धमाल' फिल्म के उस सीन जैसा लगता है, जहाँ हर किरदार की नजरें सिर्फ और सिर्फ उस '10 करोड़ के खजाने' पर टिकी होती हैं। परसा कोल माइंस से मिले करोड़ों रुपये के बजट की फाइलें खुलते ही वनमंलड में DFO की वापसी होती है और पोड़ी बचरा CA  का शांत पड़ा वनीकरण प्रोजेक्ट अचानक स्पीड पकड़ लेता है। ठीक इसी मोड़ पर बैकुंठपुर के स्थानीय निवासी और वानण्डल के पूर्व रेंजर साहब अब SDO की पावरफुल भूमिका में सामने आते हैं। लोकल भूगोल का कोना-कोना जानने के कारण इस भारी-भरकम प्रोजेक्ट से जुड़ जाते है। वहीं दफ्तर के कोने में शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके मानचित्रकार का अंदाज़  "हम अंग्रेजों के ज़माने के मानचित्रकार हैं!" की तर्ज पर बिना किसी आधिकारिक जवाबदेही के कुर्सी से चिपके दिखते हैं। वहीं एक 'कथित क्षेत्रीय शुभचिंतक' ठेकेदारी के समीकरण सेट कर रहा है। इस पूरी स्टारकास्ट के बीच  रेंजर साहब फूले नहीं समा रहे—क्योंकि जब ऊपर से 'ग्रीन सिग्नल' हो, तो जमीनी बदहाली की फिक्र किसे होती है!



​ 'धमाल' की तर्ज पर सिस्टम को ठेंगा दिखाकर काम शुरू

फिल्म 'धमाल' में जैसे बिना किसी प्लानिंग के सीधे ज़मीन खोदना शुरू कर दिया जाता था, मुगम बारी में भी कुछ इसी  अंदाज वही रीटेक दोहराया जा रहा है। वन विभाग के नियम (SOP) कहते हैं कि पहले ज़मीन की सफाई (साइट क्लीयरेंस), समतलीकरण, फेंसिंग और पानी का इंतज़ाम होना चाहिए, उसके बाद गड्ढे खुदने चाहिए। लेकिन यहाँ का ड्रामा बिल्कुल उल्टा फिल्माया जा रहा है—न ज़मीन साफ हुई, न सुरक्षा घेरा बना और न सिंचाई की एक बूंद दिखी... सीधे मजदूरों को उतारकर गड्ढा खुदाई शुरू करा दी गई। शुरुवाती  व्यवस्था का नामोनिशान नहीं है, पर कुदालें बज रही हैं। यह कोई वनीकरण की गंभीरता नहीं, बल्कि सिर्फ मस्टर रोल भरकर बजट पचाने का 'कागजी स्टंट' नजर आ रहा है।



​ मजदूरों का दर्द: ₹20 की प्रस्तावित दर और ठप होता काम

​फिल्म में जैसे 'मानव' और 'आदित्य' से हाड़-तोड़ काम करवाकर अंत में निराशा हाथ लगती थी, वैसा ही सीन मुगूम बारी के मैदान में घट रहा है। हालांकि मजदूरों को अभी भुगतान नहीं हुआ है, लेकिन उनका स्पष्ट कहना है कि अधिकारियों ने प्रति गड्ढा महज ₹20 देने की बात कही है। मुरम और अत्यधिक पत्थरीली जमीन पर दोपहर की धूप में 2×2 फीट का गड्ढा खोदकर मजदूर दिनभर में मुश्किल से 10 गड्ढे भी तैयार नहीं कर पाता है, यानी दिनभर की कुल दिहाड़ी का अंदाजा आप लगा सकते है मेहनत के अनुपात में इस ₹20 के रेट को मजदूरों ने सरासर अन्याय और शोषण करार दिया है।

​नियमों के साथ खिलवाड़

यह पूरा घटनाक्रम किसी ऐसी फिल्म की शूटिंग जैसा है जो गलत मौसम में की जा रही हो। वनीकरण के वैज्ञानिक नियम और मौसम का मिजाज साफ कहते हैं कि गड्ढा खुदाई का सही वक्त अक्टूबर के बाद (ठंड में) होता है, ताकि धूप और हवा से मिट्टी का प्राकृतिक उपचार हो सके। लेकिन वन विभाग भारी बारिश के बीचों-बीच गड्ढे खुदवाने की ज़िद पर अड़ा है। गड्ढे पानी से भरकर कीचड़ में तब्दील हो रहे हैं। वैज्ञानिक तरीका और नियम ताक पर हैं, मानो अफसरों को पौधों को ज़िंदा रखने से कोई मतलब नहीं, बस समय-सीमा के भीतर बजट के आंकड़ों की एंट्री पूरी करनी है।

​बिना तैयारी के 'रोल-कैमरा-एक्शन'

ग्राउंड जीरो का दृश्य देखकर लगता है कि वन विभाग ने बिना किसी तैयारी के सीधे 'एक्शन' बोल दिया है। जिस ज़मीन पर नया पौधा रोपा जाना है, वहां घुटनों तक उगी जंगली घास और कंटीली झाड़ियों का राज है। नियम के मुताबिक पहले पूरे इलाके की सफाई होनी चाहिए थी, लेकिन झाड़ियों के बीच ही जैसे-तैसे कुदाल चलाकर औपचारिकता पूरी की जा रही है। अगर इस घने जंगल के बीच नया पौधा लगा भी दिया जाए, तो जंगली खरपतवार उसका दम घोंट देगी। यह दृश्य साबित करता है कि धरातल पर तैयारी के नाम पर सिर्फ शून्य है।



​बिना फेंसिंग के 'ओपन गार्डन'

मैदान का अगला सीन किसी कॉमेडी ड्रामा जैसा है। करोड़ों रुपये का बजट होने के बाद भी पूरे प्लांटेशन क्षेत्र में सुरक्षा फेंसिंग (तार घेरा) का कोई वजूद नहीं है। आवारा मवेशी बेखौफ होकर खुदे हुए गड्ढों के बीच टहल रहे हैं। बिना फेंसिंग के पौधरोपण का यह काम वैसा ही है जैसे बिना चौकीदार के खुली सड़क पर खजाना छोड़ देना! मवेशियों की बेरोक-टोक आवाजाही यह साबित करती है कि अफसरों का ध्यान लगने वाले पौधों को बचाने पर बिल्कुल नहीं, बल्कि केवल ठेकेदारी और बजट ठिकाने लगाने पर केंद्रित है।

​क्या 'W' का खजाना बचेगा या फाइल दफन होगी?

इस पूरी खोजी रिपोर्ट का क्लाइमैक्स एक बड़े सवाल पर आकर रुकता है। परसा कोल माइंस के एवज में मिला करोड़ों रुपये का यह फंड क्या इसी तरह बिना फेंसिंग, बिना पानी, बिना सफाई और मजदूरों के असंतोष की बलि चढ़कर 'प्रशासनिक सिंडिकेट' की जेब में चला जाएगा? क्या विभाग के आला अधिकारी इस 'धमाल' शैली के कागजी दावों और धरातलीय बदहाली की निष्पक्ष जांच कराएंगे, या फिर हर बार की तरह इस बार भी करोड़ों का वनीकरण सिर्फ फाइलों में हरा-भरा दिखाकर दफन कर दिया जाएगा?

बेपरवाह व्यवस्था! रिटायरमेंट के बाद भी दफ्तर में जमे मानचित्रकार; अधिकारियों की मौन स्वीकृति का आखिर क्या है मतलब?

नियमित कर्मचारी की तरह रोजाना निपटा रहे सरकारी काम; कोरिया वन मंडल में नियमों को ठेंगा दिखाने का खेल जारी!



बैकुंठपुर। कोरिया वन मंडल में सेवानिवृत्त होने के बाद भी शासकीय कार्यों का निपटारा कर रहे मानचित्रकार सी.पी. पटेल का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। प्रथम दृष्टया गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और शासकीय नियमों की अनदेखी उजागर होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की रहस्यमयी चुप्पी इस पूरे घटनाक्रम को और संदिग्ध बना रही है।​रिटायरमेंट के महीने भर बाद भी सी.पी. पटेल का एक नियमित कर्मचारी की तरह रोजाना वन मंडल कार्यालय आना, शासकीय सीट पर बैठना और गोपनीय फाइलों व नक्शों का निपटारा करना अब व्यवस्था पर बड़ा प्रहार कर रहा है।

​अधिकारियों की चुप्पी के आखिर क्या हैं मायने?क्या अनधिकृत मौजूदगी को मौन स्वीकृति?

कार्यालय प्रमुख और वरिष्ठ अधिकारियों की नाक के नीचे एक सेवानिवृत्त व्यक्ति बेधड़क सरकारी रिकॉर्ड खंगाल रहा है। ऐसे में अधिकारियों की यह चुप्पी सवाल खड़ा करती है कि क्या उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है, या फिर जानबूझकर इसे संरक्षण दिया जा रहा है?

​गोपनीयता के उल्लंघन पर आंखें मूंदे क्यों बैठा है वन विभाग?

शासकीय अभिलेखों और वन मंडल के नक्शों की एक गोपनीयता होती है। बिना किसी वैधानिक आदेश के किसी बाहरी व्यक्ति को इन दस्तावेजों तक खुली पहुंच देना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। इसके बावजूद जिम्मेदारो की मौन समझ से परे है।

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फाइलों में ऐसा क्या है, जिसे नए कर्मचारी को नहीं सौंपा जा सकता?

चर्चा जोरों पर है कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी या राज़ है कि सी.पी. पटेल का विकल्प विभाग को नहीं मिल पा रहा? क्या किसी पुराने लेनदेन, सीमांकन के विवादों या संवेदनशील फाइलों को सुलझाने/छिपाने के लिए ही उनकी उपस्थिति अनिवार्य बनाई गई है?

गड़बड़ी हुई तो बलि का बकरा कौन?

जिस प्रकार  नियमित कर्मचारियों की तरह रिटायर्यड  मानचित्रकार का कार्यकाल में मौजूदगी देखने को मिल रहा है, यदि कल  किसी नक्शे में फेरबदल या दस्तावेजों में कोई छेड़छाड़ की जाती है, तो कानूनी तौर पर किस अधिकारी पर कार्रवाई होगी? सवाल यह है कि,क्या चुप्पी साधे बैठे आला अधिकारी इसकी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं?

​DFO से संपर्क का प्रयास फिर विफल 

​इस पूरे गंभीर मामले और उठते सवालों पर कोरिया वनमंडलाधिकारी (DFO) चंद्रशेखर शंकर सिंह परदेशी से उनका पक्ष जानने के लिए दूरभाष (कॉल) के माध्यम से संपर्क साधने का पुनः प्रयास किया गया, परंतु उनसे संपर्क स्थापित नहीं हो सका।जिम्मेदार अधिकारियों का फोन न उठाना और मामले से दूरी बनाना यह साबित करता है कि वन विभाग इस अनधिकृत कार्यशैली पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा है। अब देखना यह है कि विभाग  अधिकारी इस पर संज्ञान लेकर क्या कार्रवाई करते हैं।


गणेश उत्सव और कर्मा पूजा की धूम: मांदर की थाप पर थिरके अशोक जायसवाल, अपनों के बीच पाकर खिले लोगों के चेहरे


कोरिया -जिले में इन दिनों गणेशोत्सव की भक्तिमय बहार के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक-संस्कृति और पारंपरिक त्योहार 'कर्मा पूजा' का उल्लास चरमोत्कर्ष पर है। एक ओर जहाँ घर-घर और गली-मोहल्लों में स्थापित गणेश पंडालों में मंत्रोच्चार और आरती की गूंज है, वहीं दूसरी ओर कर्मा पूजा में मांदर की गूंज और पारंपरिक गीतों की धुन ने उत्सव के माहौल को दोगुना कर दिया है।

इसी पावन अवसर पर पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष एवं जिला कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष अशोक जायसवाल ने क्षेत्र के विभिन्न गणेश पंडालों और कर्मा पूजा आयोजनों में पहुँचकर पूजा-अर्चना की तथा क्षेत्रवासियों की सुख, शांति और खुशहाली की कामना की।

गणेश पंडालों में टेका माथा, मांगी खुशहाली की दुआ

अशोक जायसवाल ने क्षेत्र के अनेक सार्वजनिक गणेश पंडालों का दौरा किया। उन्होंने सार्वजनिक गणेश पूजा समिति दीवानी बांध, मनसुख, अंगा, पूटा, पटना बड़का पारा, मजगवा, आमापारा, केनापारा बीच गली और साल्ही सहित बैमा और अनेक ग्रामीण अंचलों में स्थापित गणेश प्रतिमाओं के दर्शन कर भगवान श्री गणेश से क्षेत्र की समृद्धि का आशीर्वाद मांगा।



मांदर की थाप पर थिरकी लोक-संस्कृति

छत्तीसगढ़ी परंपरा और लोक-संस्कृति का अनूठा दृश्य तब देखने को मिला जब अशोक जायसवाल सार्वजनिक गणेश पूजा समिति केनापारा बीच गली और बैमा में आयोजित कर्मा पूजा में शामिल हुए। कर्मा पूजा के दौरान वे स्वयं को छत्तीसगढ़िया माटी के इस पारंपरिक उत्सव से अलग नहीं रख सके और मांदर थामकर उसकी सुरीली थाप पर थिरकते नज़र आए। मांदर की थाप और कर्मा गीतों की धुन के बीच पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष का यह आत्मीय अंदाज़ देख उपस्थित जनसमूह झूम उठा।

अपनों के बीच पाकर लोगों में दिखा अपार उत्साह

अपने जनप्रिय नेता और आत्मीय साथी अशोक जायसवाल को अपने बीच साधारण ढंग से कर्मा पूजा में मांदर बजाते और गणेश उत्सव की खुशियाँ बाँटते देखकर स्थानीय ग्रामीण, बुजुर्ग, माताएँ, बहनें और युवा बेहद खुश और उत्साहित नज़र आए। लोगों ने सहर्ष उनका स्वागत किया और त्यौहार की खुशियों को एक साथ साझा किया।

बंदियों के अधिकारों की सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी-प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, जिला जेल बैकुण्ठपुर के तिमाही निरीक्षण में विधिक सहायता, भोजन, स्वच्छता एवं मूलभूत सुविधाओं का लिया जायजा


कोरिया/ राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नई दिल्ली के निर्देशों एवं माननीय उच्चतम न्यायालय के रिट पीटिशन (सी) क्रमांक 1404/2023 सुकन्या संस्था विरुद्ध यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य में पारित निर्णय के अनुपालन में आज जिला जेल बैकुण्ठपुर का तिमाही निरीक्षण किया गया। निरीक्षण का उद्देश्य जेल में निरुद्ध बंदियों के अधिकारों की सुरक्षा, उन्हें उपलब्ध मूलभूत सुविधाओं की स्थिति तथा बिना किसी भेदभाव के विधिक सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना रहा।

प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश बैकुण्ठपुर योगेश पारीक, पुलिस अधीक्षक  हरिश राठौर एवं अपर कलेक्टर  सुरेन्द्र प्रसाद वैद्य के नेतृत्व में निरीक्षण दल ने जिला जेल का विस्तृत जायजा लिया। इस दौरान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्रीमती प्रतीक्षा अग्रवाल, सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण श्रीमती अमृता दिनेश मिश्रा सहित डिस्ट्रिक्ट विजिटर्स बोर्ड के सदस्य एवं संबंधित अधिकारी उपस्थित रहे।


बंदियों से सीधे संवाद कर सुनी समस्याएं

निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने जेल में निरुद्ध बंदियों से सीधे संवाद किया और उनकी समस्याओं, आवश्यकताओं तथा उन्हें प्राप्त हो रही सुविधाओं की जानकारी ली। बंदियों को उपलब्ध कराई जा रही विधिक सहायता की भी जानकारी ली गई तथा यह सुनिश्चित किया गया कि जरूरतमंद बंदियों को समय पर विधिक सेवाएं उपलब्ध हों और किसी भी बंदी को उसकी सामाजिक या जातिगत पहचान के आधार पर किसी प्रकार के भेदभाव का सामना न करना पड़े। निरीक्षण के दौरान बंदियों के बैरकों, साफ-सफाई एवं स्वच्छता व्यवस्था का भी अवलोकन किया गया।अधिकारियों ने बंदियों को प्रदान किए जा रहे भोजन की गुणवत्ता की जांच की और व्यवस्थाओं के संबंध में आवश्यक जानकारी ली।


लीगल एड क्लिनिक के माध्यम से मिल रही विधिक सहायता की समीक्षा

जिला जेल में स्थापित लीगल एड क्लिनिक का निरीक्षण कर वहां उपलब्ध सुविधाओं एवं बंदियों को प्रदान की जा रही विधिक सहायता की समीक्षा की गई।अधिकारियों ने यह सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया कि विधिक सहायता से वंचित कोई भी पात्र बंदी न रहे तथा प्रत्येक जरूरतमंद व्यक्ति तक न्याय और विधिक सहायता की पहुंच सुनिश्चित हो। निरीक्षण के दौरान जेल अधीक्षक  शेख आविद रजा, लीगल एड डिफेंस कौंसिल डिप्टी चीफ  के.बी. नामदेव एवं पैरालीगल वॉलिंटियर्स उपस्थित रहे।

हर बंदी के अधिकारों की रक्षा पर विशेष जोर

माननीय उच्चतम न्यायालय के रिट पीटिशन (सी) क्रमांक 1404/2023 में 03 अक्टूबर 2024 को पारित निर्णय के दिशा-निर्देशों के अनुपालन में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण एवं डिस्ट्रिक्ट विजिटर्स बोर्ड कोरिया द्वारा जिला जेल बैकुण्ठपुर का प्रत्येक तिमाही में निरीक्षण किया जाता है।इस व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य जेल में निरुद्ध प्रत्येक व्यक्ति के साथ मानवीय एवं गरिमापूर्ण व्यवहार सुनिश्चित करना तथा जातिगत अथवा किसी भी अन्य प्रकार के भेदभाव की संभावना को समाप्त करना है। निरीक्षण के दौरान वर्तमान व्यवस्थाओं में जातिगत अथवा अन्य किसी प्रकार का भेदभाव नहीं पाया गया।

अधिकारियों ने कहा कि कानून के समक्ष प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा और जरूरतमंदों तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करना विधिक सेवा व्यवस्था की मूल भावना है। जेल भी समाज का ही एक हिस्सा है और यहां निरुद्ध प्रत्येक व्यक्ति को अपने अधिकारों, सम्मान तथा आवश्यक विधिक सहायता की जानकारी मिलना आवश्यक है।

कोरिया वन मंडल में रिटायरमेंट के बाद भी डटे सेवानिवृत्त मानचित्रकार! न पद, न आदेश... फिर भी दफ्तर में रोजाना हाजिरी; नक्शों व फाइलों में फेरबदल हुआ तो कौन होगा जिम्मेदार?



बैकुंठपुर। कोरिया वन मंडल कार्यालय से एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जहां नियम-कायदों को ताक पर रखकर शासकीय कार्य संपादित कराए जा रहे हैं। वन मंडल में पदस्थ रहे मानचित्रकार सी.पी. पटेल करीब एक माह पूर्व सेवानिवृत्त (रिटायर) हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद वे रोजाना कार्यालय पहुंचकर नियमित कर्मचारियों की तरह शासकीय कामकाज निपटा रहे हैं और फाइलों को संभाल रहे हैं।बिना किसी शासकीय आदेश के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी का कार्यालय में बैठकर काम करना प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।



गोपनीयता और दस्तावेजों की सुरक्षा पर खतरा: सेवानिवृत्ति के बाद कोई भी व्यक्ति आम नागरिक की श्रेणी में आ जाता है। ऐसे में बिना किसी पद या जिम्मेदारी के किसी बाहरी/सेवानिवृत्त व्यक्ति को शासकीय व गोपनीय दस्तावेजों तक सीधी पहुंच देना किस हद तक सही है?दफ्तर के वरिष्ठ अधिकारियों की नाक के नीचे महीने भर से चल रहा यह खेल कई कई सवाल उठाता है, कि क्या उच्च अधिकारियों को इसकी भनक नहीं है या फिर सब कुछ जानते हुए भी मौन स्वीकृति दी गई है?

बता दे कि,सेवानिवृत्त होने के बावजूद मानचित्रकार सी.पी. पटेल रोजाना कार्यालय के मानचित्र शाखा में बैठकर बेझिझक शासकीय कार्यों का संपादन करते देखे जा रहे हैं। सूत्रों की मानें तो अपने पूरे सेवाकाल के दौरान उनका कभी स्थानांतरण नहीं हुआ और वे पूरी सर्विस एक ही जगह डटे रहे। अब रिटायरमेंट के बाद भी कोरिया वन मंडल से उनका 'मोह' खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है।

क्या गहरा राज छिपा है फाइलों में? 

स्थानीय गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि आखिर ऐसा कौन सा 'विशेष मोह' या राज़ है जिसके चलते रिटायरमेंट के बाद भी उन्हें दफ्तर से दूर नहीं किया जा रहा है।एक ही स्थान पर लंबे समय तक सेवा देने के बाद रिटायरमेंट उपरांत बिना किसी आधिकारिक पद या वैधानिक आदेश के दफ्तर की फाइलें संभाले रखना विभागीय निष्पक्षता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। देखना यह होगा कि मामले में उच्चाधिकारी इस पर कोई कड़ा संज्ञान लेते हैं या 'मोह' का यह सिलसिला ऐसे ही जारी रहता है ।

"इस पूरे मामले में कोरिया वनमंडलाधिकारी (DFO) चंद्रशेखर शंकर सिंह परदेशी से उनका पक्ष जानने के लिए दूरभाष के माध्यम से संपर्क करने का प्रयास किया गया, परंतु उनसे संपर्क नहीं हो सका।


खेत में काम कर रहे नाबालिग पर गिरी आकाशीय बिजली, मौत; संकट की घड़ी में मदद को आगे आए अशोक जायसवाल

तेज बारिश के दौरान बड़े साल्ही गाँव में हुआ दुखद हादसा

​पूर्व पालिका अध्यक्ष अशोक जायसवाल ने तत्काल कराई एम्बुलेंस की व्यवस्था, परिजनों को बंधाया ढांढस







​बैकुंठपुर / कोरिया:

कोरिया जिले के ग्राम बड़े साल्ही में बीते 17 सितंबर को कुदरत का कहर टूट पड़ा। तेज बारिश के बीच खेत में काम कर रहे एक नाबालिग की आकाशीय बिजली गिरने से मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई। इस अचानक हुए हादसे से परिवार की खुशियां छिन गईं और पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई।

​सूचना मिलते ही हरकत में आई व्यवस्था-घटना के बाद स्थानीय पुलिस की सहायता से शव को उप स्वास्थ्य केंद्र बचरा पोंडी लाया गया। इसके बाद शव को पोस्टमार्टम एवं आगे की प्रक्रिया के लिए जिला अस्पताल बैकुंठपुर पहुँचाने की आवश्यकता थी।

​मामले की जानकारी मिलते ही ग्राम बड़े साल्ही निवासी सरवन ने पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष एवं जिला कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष अशोक जायसवाल से संपर्क कर स्थिति से अवगत कराया।

​त्वरित समन्वय से मिली मदद-सूचना पाते ही अशोक जायसवाल ने तत्काल जिला अस्पताल प्रबंधन से समन्वय स्थापित किया और त्वरित पहल करते हुए बचरा पोंडी के लिए एम्बुलेंस रवाना करवाई। एम्बुलेंस के पहुँचते ही शव को सम्मानपूर्वक जिला चिकित्सालय बैकुंठपुर लाया गया, जहाँ उसे पोस्टमार्टम कक्ष में सुरक्षित रखवाया गया।

​मानवीय संवेदनाओं की मिसाल-​अशोक जायसवाल ने अस्पताल पहुँचकर शोकाकुल परिजनों से मुलाकात की और इस कठिन समय में उन्हें ढांढस बंधाया। दुख की इस घड़ी में परिवार के साथ खड़े होकर तुरंत सहायता उपलब्ध कराने की इस मानवीय पहल की ग्रामीणों ने सराहना की।

​यह हादसा परिवार के लिए एक अपूरणीय क्षति है, लेकिन विपदा के समय में मिली इस त्वरित मदद और सहयोग ने यह संदेश दिया कि संवेदनशीलता और सामाजिक एकजुटता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।